रिपोर्ट्स के अनुसार इन डिवाइसों को बैंक की आईटी टीम ने कड़े नियंत्रण में कॉन्फ़िगर किया है और इनमें सामान्य कार्य फ़ोन की तुलना में बहुत कम सुविधाएँ हैं।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इनमें मुख्य रूप से यह सुविधाएँ होती हैं:
इसके अलावा कई आंतरिक सिस्टम, बड़े डेटा डाउनलोड, और संवेदनशील फाइलों तक पहुंच सीमित या अनुपलब्ध रखी जाती है। हालांकि बैंक ने तकनीकी सेट‑अप का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया है।
यह मॉडल साइबर सुरक्षा के एक आम सिद्धांत पर आधारित है: यदि डिवाइस खो जाए, जांच के लिए लिया जाए या हैक हो जाए, तो उसमें महत्वपूर्ण जानकारी मौजूद ही न हो।
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने डेटा प्रबंधन और साइबर सुरक्षा को लेकर कई व्यापक कानून लागू किए हैं, जिनका असर विदेशी कंपनियों पर भी पड़ता है।
इनमें प्रमुख हैं:
इन कानूनों के कारण कई स्थितियों में कंपनियों को डेटा चीन के भीतर ही रखने या सीमा‑पार डेटा ट्रांसफर के लिए नियामकीय मंजूरी लेने की जरूरत पड़ सकती है।
अमेरिकी सरकारी विश्लेषणों में यह भी कहा गया है कि चीन के राष्ट्रीय‑सुरक्षा ढांचे के तहत देश के भीतर संग्रहीत डेटा तक सरकारी एजेंसियों की पहुंच संभव हो सकती है—जिससे विदेशी कंपनियों की चिंताएं बढ़ती हैं।
मॉर्गन स्टैनली का यह कदम अलग‑थलग नहीं है। कई बहुराष्ट्रीय बैंक चीन में काम करते समय अपनी तकनीकी प्रणालियों को अलग‑अलग हिस्सों में बांट रहे हैं, ताकि चीन‑संबंधित डेटा को वैश्विक नेटवर्क से अलग रखा जा सके।
इसी दिशा में मॉर्गन स्टैनली पहले ही मुख्यभूमि चीन से 200 से अधिक टेक डेवलपर्स को बाहर स्थानांतरित कर चुका है, जिनमें से कई को हांगकांग और सिंगापुर में स्थानांतरित किया गया।
अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी और आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ कंपनियां जोखिम प्रबंधन के नए तरीके अपना रही हैं। कई बहुराष्ट्रीय संस्थान अब इन रणनीतियों का उपयोग कर रहे हैं:
इसका मकसद चीन से पूरी तरह बाहर निकलना नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक में काम जारी रखते हुए संवेदनशील वित्तीय और ग्राहक जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
जैसे‑जैसे डेटा कानून और भू‑राजनीतिक तनाव विकसित होते रहेंगे, वैसे‑वैसे अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए ऐसे ट्रैवल‑डिवाइस और डेटा‑सेगमेंटेशन नीतियां और भी आम हो सकती हैं।
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