सिटीग्रुप से जुड़े विश्लेषण का अनुमान है कि यदि संकट लंबा चला तो वैश्विक भंडार में कुल गिरावट 1.3 अरब बैरल से अधिक हो सकती है।
तेल संकट की शुरुआत में सरकारें और कंपनियाँ आम तौर पर अपने स्टोरेज से तेल निकालकर रिफाइनरियों को सप्लाई जारी रखती हैं। इससे शुरुआती झटका कम महसूस होता है।
लेकिन यह बफर हमेशा नहीं रहता।
जब भंडार “ऑपरेशनल मिनिमम” यानी न्यूनतम संचालन स्तर के करीब पहुँच जाते हैं, तो पूरी तेल आपूर्ति प्रणाली कम लचीली हो जाती है। टैंकों को पूरी तरह खाली रखना सुरक्षित नहीं होता, इसलिए बाजार के पास आपूर्ति झटकों को संभालने की क्षमता कम हो जाती है। तब कीमतें धीरे‑धीरे नहीं बल्कि अचानक उछल सकती हैं।
मॉर्गन स्टेनली ने मौजूदा स्थिति को “समय के खिलाफ दौड़” बताया है—अगर जून तक जलमार्ग नहीं खुला तो शुरुआती सुरक्षा‑बफर खत्म हो सकते हैं।
ऊर्जा बाजार उम्मीदों और जोखिम की धारणा से भी प्रभावित होते हैं।
अगर देशों या बड़े आयातकों को लगे कि वैश्विक भंडार खतरनाक स्तर तक गिर रहे हैं, तो वे प्रतिस्पर्धियों से पहले तेल सुरक्षित करने की कोशिश कर सकते हैं। इस तरह की सावधानीपूर्वक खरीदारी (precautionary buying) उपलब्ध तेल को और तेजी से कम कर सकती है और संकट को गहरा बना सकती है।
विशेष रूप से वे देश जो आयात पर अधिक निर्भर हैं, अनिश्चितता की स्थिति में अधिक आक्रामक खरीदारी कर सकते हैं।
क्योंकि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है, इसलिए लंबे अवरोध की स्थिति में कीमतों में तेज उछाल संभव है।
कुछ संभावित परिदृश्य जिनका उल्लेख विभिन्न विश्लेषणों में किया गया है:
बैंक ऑफ़ अमेरिका के कमोडिटी विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि महीनों तक नाकाबंदी जारी रहती है तो चरम स्थिति में तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती है—हालाँकि इसे सबसे खराब परिदृश्य माना जाता है।
मान लें कि कूटनीतिक या सैन्य प्रयासों से स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ फिर से खुल जाता है—तब भी तेल बाजार तुरंत सामान्य नहीं होगा। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
मॉर्गन स्टेनली के अनुसार इस व्यवधान ने तेल बाजार में एक “गहरा खालीपन” (deep air pocket) पैदा कर दिया है, जिसके कारण आपूर्ति लंबे समय तक तंग और कीमतें ऊँची रह सकती हैं।
स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के लंबे समय तक बंद रहने का खतरा सिर्फ तत्काल निर्यात रुकने तक सीमित नहीं है। असली जोखिम यह है कि वैश्विक तेल भंडार धीरे‑धीरे उस स्तर तक गिर सकते हैं जहाँ बाजार संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
अगर ऐसा हुआ, तो ऊर्जा बाजार अचानक एक सामान्य भू‑राजनीतिक झटके से निकलकर पूरी तरह के वैश्विक आपूर्ति संकट में बदल सकता है—जहाँ घटते भंडार, घबराहट में खरीदारी और तेज़ी से बढ़ती कीमतें एक साथ देखने को मिलेंगी।
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