बाद में अगस्त 2025 के संयुक्त बयान में इसकी प्रमुख शर्तें तय की गईं। मुख्य बिंदु थे:
हालांकि यह समझौता शुरू में केवल एक राजनीतिक फ्रेमवर्क था। इसे लागू करने के लिए EU को अपने कानूनों में बदलाव करना आवश्यक था।
EU संस्थानों ने इस समझौते को लागू करने के लिए दो अलग‑अलग विनियम (regulations) तैयार किए हैं, जिनका उद्देश्य टर्नबेरी डील के तहत तय टैरिफ प्रतिबद्धताओं को लागू करना है।
इस अस्थायी समझौते के तहत:
यह कदम अमेरिका को यह दिखाने के लिए भी है कि EU समझौते के अनुसार आगे बढ़ रहा है, ताकि संभावित ऊँचे अमेरिकी टैरिफ से बचा जा सके।
कानून लागू होने पर EU को:
इसके बदले अमेरिका ने सहमति दी कि:
इससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार नियम अपेक्षाकृत स्थिर और अनुमानित रहने की उम्मीद है।
हालांकि समझौते के मूल सिद्धांतों पर सहमति थी, लेकिन EU सांसदों और सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर कड़ी चर्चा हुई।
यूरोपीय संसद के सदस्यों ने मांग की कि EU टैरिफ कटौती तभी लागू हो जब अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करे। इस सुरक्षा शर्त को “सनराइज क्लॉज” कहा जाता है।
EU सांसदों ने यह भी चाहा कि अगर अमेरिका भविष्य में नए टैरिफ लगाए या बाजार में असंतुलन पैदा हो तो EU के पास जवाबी कदम उठाने का अधिकार हो। इसलिए प्रस्ताव में शामिल किया गया:
समझौते में एक समय सीमा भी तय की गई है। इसके तहत टैरिफ रियायतें 31 मार्च 2028 तक लागू रहेंगी, उसके बाद इन्हें नवीनीकृत करना होगा।
अस्थायी समझौते के बावजूद प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
मार्च 2026 में यूरोपीय संसद ने इस कानून पर पहली रीडिंग में अपना रुख अपनाया, जिससे EU सदस्य देशों के साथ आगे की बातचीत शुरू हुई।
टैरिफ कटौती लागू होने से पहले तीन चरण बाकी हैं:
अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया है कि अगर EU समय पर समझौते को लागू नहीं करता तो यूरोपीय निर्यात—खासकर कारों—पर कहीं अधिक टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
इस वजह से EU के लिए यह सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कदम है। यदि समझौता समय पर लागू हो जाता है, तो दोनों पक्षों के बीच बढ़ते व्यापार तनाव को कम किया जा सकता है और ट्रान्सअटलांटिक व्यापार में स्थिरता बनाए रखी जा सकती है।
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