अमेरिकी ट्रेज़री सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह कदम अस्थायी है और इसका मकसद संकट के दौरान ऊर्जा बाजार को संभालना है। उनके अनुसार छूट के पीछे कुछ प्रमुख कारण थे:
अधिकारियों का कहना है कि यदि समुद्र में मौजूद ये कार्गो फंस जाते, तो वैश्विक बाजार में सप्लाई और घट सकती थी और कीमतें और ऊपर जा सकती थीं।
इस निर्णय पर यूरोप में तीखी प्रतिक्रिया आई। कई यूरोपीय अधिकारियों ने चेतावनी दी कि अगर रूसी तेल को वैश्विक बाजार में आने दिया गया तो इससे मॉस्को की आय बढ़ सकती है।
यूरोपीय नेताओं और यूक्रेन के अधिकारियों ने पहले भी कहा था कि ऐसे अपवाद रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव को कमजोर करते हैं, खासकर तब जब पश्चिमी देश यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए हुए हैं।
अमेरिका के भीतर भी इस नीति का विरोध हुआ। सीनेटर माइकल बेनेट और उनके साथ कई सांसदों ने ट्रेज़री विभाग से आग्रह किया कि रूसी तेल पर पूरे प्रतिबंध फिर से लागू किए जाएँ। उनका तर्क था कि ऐसी छूटें क्रेमलिन की युद्ध वित्तपोषण क्षमता को बनाए रखती हैं।
कुछ अन्य सांसदों ने पहले भी चेतावनी दी थी कि इस तरह की छूट से “पुतिन के तेल मुनाफे” को बढ़ावा मिल सकता है।
आलोचकों का यह भी कहना है कि छूट के बावजूद वैश्विक तेल कीमतें ऊँची ही रहीं, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या इससे वास्तव में उपभोक्ताओं को राहत मिली।
उनका तर्क है कि अगर ईंधन कीमतों में खास कमी नहीं आई, तो रूस को मिलने वाली अतिरिक्त आय के मुकाबले यह नीति कम प्रभावी साबित हो सकती है।
यह विवाद एक बड़ी रणनीतिक दुविधा को दिखाता है:
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह छूट स्थायी नहीं है और केवल मौजूदा आपूर्ति संकट को संभालने के लिए दी गई है।
लेकिन आलोचकों का मानना है कि हर नई छूट यह सवाल फिर खड़ा करती है—क्या ऊर्जा संकट के समय प्रतिबंधों को ढीला करना अनिवार्य हो जाता है, या इससे उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है।
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