ताइवान की सरकार ने इस विचार का विरोध किया कि हथियार खरीदना क्षेत्रीय तनाव बढ़ाता है। ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने कहा कि अमेरिका से हथियार खरीदना क्षेत्रीय संघर्ष और अस्थिरता के खिलाफ “सबसे महत्वपूर्ण प्रतिरोधक” (deterrent) है ।
ताइपे के अधिकारियों का कहना है कि ये खरीद केवल राजनीतिक प्रतीक नहीं हैं। वे ताइवान की रक्षा क्षमता मजबूत करने और संभावित खतरों को रोकने के व्यापक सुरक्षा ढांचे का हिस्सा हैं ।
ताइवान का मानना है कि यदि उसके पास मजबूत रक्षात्मक क्षमता होगी, तो किसी भी संभावित हमले की लागत और जोखिम बढ़ जाएंगे—जिससे संघर्ष की संभावना कम हो जाती है।
ताइवान को हथियार देने की अमेरिकी नीति का आधार Taiwan Relations Act (TRA) है, जिसे अमेरिकी कांग्रेस ने 1979 में पारित किया था। उसी वर्ष अमेरिका ने औपचारिक रूप से चीन की पीपुल्स रिपब्लिक को मान्यता दी और ताइवान के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध समाप्त कर दिए थे।
इस कानून के कुछ प्रमुख सिद्धांत हैं:
इन्हीं सिद्धांतों ने दशकों से अमेरिका‑ताइवान संबंधों की सुरक्षा संरचना को दिशा दी है।
कई नीति विशेषज्ञों के अनुसार निरोध (deterrence) तभी प्रभावी होता है जब वह विश्वसनीय और लगातार हो। यदि ताइवान अपनी रक्षा करने में सक्षम है, तो किसी भी संभावित आक्रमण की लागत बहुत अधिक हो जाती है।
इस रणनीति का लक्ष्य ताइवान स्ट्रेट में मौजूदा स्थिति—जिसे अक्सर स्टेटस क्वो कहा जाता है—को बनाए रखना है। इसमें ताइवान अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाता है, अमेरिका शांतिपूर्ण समाधान के समर्थन का संकेत देता है और संभावित आक्रामक कदम उठाने वालों को हतोत्साहित किया जाता है।
इसके विपरीत, यदि हथियार बिक्री को चीन के साथ बातचीत में इस्तेमाल किया जाने लगे, तो यह रणनीतिक अनिश्चितता पैदा कर सकता है—जो निरोध को मजबूत करने के बजाय कमजोर भी कर सकता है।
विवाद के केंद्र में एक बड़ा सवाल है: क्या ताइवान की रक्षा सहायता को कूटनीतिक सौदेबाजी का साधन माना जाए, या इसे अमेरिकी कानून और दीर्घकालिक नीति के तहत स्थिर प्रतिबद्धता के रूप में देखा जाए?
अमेरिकी विद्वानों और ताइवान के अधिकारियों का कहना है कि दूसरा रास्ता ज्यादा सुरक्षित है। उनके अनुसार, ताइवान रिलेशंस एक्ट के अनुरूप लगातार और स्पष्ट समर्थन ही गलत आकलन के जोखिम को कम करता है—और ताइवान स्ट्रेट में शांति और स्थिरता बनाए रखने में मदद करता है।