हालांकि अप्रैल में युद्धविराम लागू हुआ, दोनों पक्ष एक‑दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगाते रहे हैं और सीमा पर छिटपुट हमले जारी हैं।
मूल युद्धविराम 16 अप्रैल 2026 को घोषित किया गया था। यह समझौता अमेरिका की मध्यस्थता से हुआ था और इसका उद्देश्य तत्काल लड़ाई रोकना तथा आगे की बातचीत का रास्ता खोलना था।
मई के मध्य में वॉशिंगटन में हुई वार्ता के बाद दोनों देशों ने युद्धविराम को 45 दिनों के लिए बढ़ाने पर सहमति दी। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार इसका मकसद आगे की राजनीतिक और सुरक्षा वार्ताओं को आगे बढ़ाने का समय देना है।
आने वाले हफ्तों में इज़राइली और लेबनानी प्रतिनिधियों के बीच और बैठकें होने की उम्मीद है, ताकि पूर्ण युद्ध की स्थिति बनने से रोका जा सके।
लगातार हमलों के कारण लेबनान में गंभीर मानवीय संकट पैदा हो गया है।
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 2 मार्च 2026 से अब तक इज़राइली हमलों में लगभग 2,882 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें सैकड़ों महिलाएँ और बच्चे शामिल हैं।
युद्धविराम लागू होने के बाद भी हिंसा नहीं रुकी। अधिकारियों के अनुसार 17 अप्रैल से अब तक लगभग 380 लोगों की मौत और 1,100 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
लड़ाई के कारण बड़ी संख्या में लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मई के मध्य तक 127,000 से अधिक लोग राहत शिविरों में रह रहे थे, और हजारों परिवार विस्थापित हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने चेतावनी दी है कि लगातार हमलों से पहले से ही कमजोर लेबनानी अर्थव्यवस्था और मानवीय स्थिति और बिगड़ सकती है।
इज़राइल और हिज़्बुल्लाह दोनों अपने सैन्य अभियानों को रक्षात्मक या जवाबी कार्रवाई बताते हैं।
हिज़्बुल्लाह का कहना है कि उसके हमले तेहरान पर हुए हमलों के जवाब में हैं और वह ईरान के समर्थन में कार्रवाई कर रहा है।
दूसरी ओर इज़राइल का कहना है कि उसके एयरस्ट्राइक हिज़्बुल्लाह के सैन्य ढांचे और ईरान समर्थित समूहों को निशाना बनाते हैं, जो इज़राइल पर हमले करते हैं।
कई देशों ने हिज़्बुल्लाह को संकट बढ़ाने के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 को लागू करने की मांग की है, जिसमें दक्षिणी लेबनान में सशस्त्र समूहों को हटाने और सीमा सुरक्षा की व्यवस्था शामिल है।
इस संघर्ष के बीच अमेरिका की मध्यस्थता से वॉशिंगटन में इज़राइल और लेबनान के बीच बातचीत हो रही है। ये दशकों में दोनों देशों के बीच सबसे दुर्लभ प्रत्यक्ष कूटनीतिक संपर्कों में से एक मानी जा रही है।
इन वार्ताओं का उद्देश्य तत्काल संघर्ष को नियंत्रित करना और भविष्य में सीमा सुरक्षा तथा राजनीतिक व्यवस्था को लेकर समझौता ढूंढना है।
लेकिन बातचीत आसान नहीं है। हिज़्बुल्लाह ने लेबनान के इज़राइल के साथ सीधे वार्ता में शामिल होने का विरोध किया है, और कई प्रमुख मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं।
अमेरिका ने लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ औन और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच संभावित बैठक का सुझाव दिया था। लेकिन औन ने फिलहाल ऐसी किसी बैठक से इनकार कर दिया है।
उनका कहना है कि पहले इज़राइली हमले रुकने चाहिए और एक सुरक्षा समझौता होना चाहिए, उसके बाद ही किसी शीर्ष स्तर की बैठक पर विचार किया जा सकता है।
औन के अनुसार अभी प्राथमिकता युद्धविराम को मजबूत करना और सुरक्षा गारंटी तय करना है, न कि सीधे नेता‑स्तर की बातचीत।
45 दिन का नया विस्तार फिलहाल बड़े पैमाने की लड़ाई को रोकने में मदद कर सकता है, लेकिन सीमा पर तनाव बना हुआ है। हवाई हमले, रॉकेट हमले और लगातार बढ़ती हताहतों की संख्या दिखाती है कि संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।
जब तक हिज़्बुल्लाह की भूमिका, इज़राइल की सुरक्षा मांगें और सीमा पर स्थायी व्यवस्था जैसे मूल मुद्दों का समाधान नहीं होता, तब तक यह युद्धविराम स्थायी शांति के बजाय केवल एक अस्थायी विराम ही माना जाएगा।
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