यह संकट व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष से जुड़ा है जो 2026 की शुरुआत में तेज़ हुआ।
रिपोर्टों के अनुसार 28 फ़रवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसके बाद तनाव तेजी से बढ़ा और व्यापक टकराव शुरू हो गया।
इन हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही पर नियंत्रण बढ़ा दिया और चेतावनी दी कि हमलों में शामिल देशों से जुड़े जहाज़ों को रास्ता नहीं दिया जाएगा।
इस कदम के बाद दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक पर जहाज़ों की आवाजाही अचानक कम हो गई।
प्रतिबंधों के कारण बड़ी संख्या में जहाज़ जलडमरूमध्य के आसपास रुक गए।
यह संख्या लगातार बदलती रही क्योंकि कुछ जहाज़ों को अनुमति मिलती रही जबकि अन्य जहाज़ों ने रास्ता बदल दिया या इंतजार किया।
ईरान द्वारा समन्वय की शर्त रखने के बाद कई देशों ने सीधे कूटनीतिक रास्ता अपनाया।
थाईलैंड इसका प्रमुख उदाहरण है। होर्मुज़ के पास आठ थाई‑ध्वज वाले जहाज़ फंस जाने के बाद थाई अधिकारियों ने ईरान से बातचीत की और बाद में अपने कुछ तेल टैंकरों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया।
पाकिस्तान ने भी बातचीत के बाद व्यवस्था बनाई, जिसके तहत 20 पाकिस्तानी झंडे वाले जहाज़ों को चरणबद्ध तरीके से गुजरने की अनुमति मिली।
क्षेत्रीय रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि मलेशिया ने कूटनीतिक संपर्कों के बाद कुछ जहाज़ों के लिए रास्ता हासिल किया, हालांकि इस दावे के स्रोत अपेक्षाकृत कम स्पष्ट हैं।
इस बीच ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड और जापान जैसे कई देशों ने जलडमरूमध्य में सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन जताया है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का एक प्रमुख केंद्र है। फारस की खाड़ी के तेल और गैस उत्पादक देशों से एशिया, यूरोप और दुनिया के अन्य बाज़ारों तक ऊर्जा इसी मार्ग से जाती है।
जब इस मार्ग पर जोखिम बढ़ता है, तो कई असर तुरंत दिखाई देते हैं:
यानी आंशिक व्यवधान भी वैश्विक बाज़ारों पर बड़ा असर डाल सकता है।
यह संकट समुद्री कानून से जुड़े पुराने विवादों को भी सामने ले आया है।
संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अनुसार अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए उपयोग होने वाले जलडमरूमध्यों में जहाज़ों को ट्रांज़िट पैसेज का अधिकार होता है—मतलब उन्हें बिना बाधा लगातार गुजरने की अनुमति होनी चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय मार्गों को सामान्यतः किसी एक देश की अनुमति पर आधारित कॉरिडोर में नहीं बदला जा सकता।
हालांकि होर्मुज़ की स्थिति जटिल है क्योंकि यह जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित है, और ईरान लंबे समय से नौवहन अधिकारों की अलग व्याख्या करता रहा है।
2026 का होर्मुज़ संकट यह दिखाता है कि भू‑राजनीतिक तनाव कितनी तेजी से वैश्विक व्यापार की बुनियादी संरचनाओं को प्रभावित कर सकता है।
एक ऐसा समुद्री मार्ग जो सामान्यतः नियमित व्यापारिक यातायात के लिए खुला रहता है, अचानक राजनीतिक सौदेबाज़ी का साधन बन गया है—जहाँ जहाज़ों को गुजरने के लिए सैन्य ताकत से ज़्यादा कूटनीति पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
जब तक क्षेत्रीय तनाव बना रहता है, तब तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही केवल समुद्री नियमों पर नहीं बल्कि राजनीतिक बातचीत, सैन्य संतुलन और बदलते गठबंधनों पर भी निर्भर रह सकती है।
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