नई स्टडी के मुताबिक अंटार्कटिका की आइस शेल्फ से निकलने वाला पिघला पानी आसपास के महासागर की धाराओं को बदल देता है, जिससे और अधिक गर्म पानी बर्फ के नीचे पहुँचकर पिघलने की गति बढ़ा सकता है। क्योंकि आइस शेल्फ पीछे मौजूद विशाल हिमचादरों को थामे रखती हैं, उनके पतले होने से ग्लेशियर तेज़ी से समुद्र में बह सकते हैं और समुद्...

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: What did the new Nature Geoscience study find about how Antarctic ice shelf melt creates a self-reinforcing feedback loop, why this suggests. Article summary: The study says meltwater flowing off Antarctic ice shelves freshens and alters the surrounding ocean, which can reorganize circulation and increase delivery of warm water to the underside of ice shelves.. Topic tags: general, education, general web, user generated, government. Reference image context from search candidates: Reference image 1: visual subject "Schematic illustration of the mechanism of East Antarctic Ice Sheet melting in Dronning Maud Land.Around 9,000 years ago, at the time when the regional sea level reached its peak," source context "Antarctic ice melt triggers further melting: Evidence for cascading feedbacks 9,000 years ago – Hokkaido Univer
अंटार्कटिका के चारों ओर तैरती विशाल आइस शेल्फ (बर्फ की तैरती चादरें) पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये पीछे मौजूद ग्लेशियरों और बर्फ की मोटी परतों को समुद्र की ओर तेज़ी से बहने से रोकती हैं। अब नई रिसर्च बताती है कि इन आइस शेल्फ का पिघलना एक ऐसे चक्र को जन्म दे सकता है जो खुद ही पिघलन को और तेज़ करता जाता है।
Nature Geoscience में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, आइस शेल्फ से निकलने वाला पिघला हुआ मीठा पानी आसपास के समुद्र की धाराओं को बदल सकता है। इससे अपेक्षाकृत गर्म समुद्री पानी बर्फ के नीचे और अधिक पहुँचने लगता है—और परिणामस्वरूप पिघलने की गति बढ़ जाती है।
यह संकेत देता है कि समुद्र स्तर बढ़ने के कुछ मौजूदा वैश्विक अनुमान संभवतः कम हो सकते हैं, क्योंकि कई जलवायु मॉडल अभी इस प्रक्रिया को पूरी तरह शामिल नहीं करते।
आइस शेल्फ का बड़ा हिस्सा समुद्र के ऊपर दिखाई देता है, लेकिन उनका एक विशाल भाग पानी के नीचे भी होता है। जब नीचे से पिघलन होती है तो बहुत मात्रा में ठंडा, मीठा पानी समुद्र में मिल जाता है।
अध्ययन में पाया गया कि यह मीठा पानी आसपास के समुद्री पानी की घनत्व संरचना बदल देता है और स्थानीय महासागरीय परिसंचरण (circulation) को पुनर्गठित कर सकता है।
इसके बाद क्या होता है:
इस तरह एक फीडबैक लूप बन जाता है—जहाँ पिघलन खुद ही ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती है जो आगे और पिघलन को बढ़ावा देती हैं। वैज्ञानिक इसे अंटार्कटिका की बर्फ के नुकसान का एक “छिपा हुआ तेज़ी लाने वाला कारक” मानते हैं।
वैश्विक जलवायु मॉडल आम तौर पर अलग‑अलग प्रक्रियाओं—जैसे महासागर का गर्म होना, ग्लेशियरों का पिघलना और हिमचादरों की गतिशीलता—को जोड़कर भविष्य में समुद्र स्तर बढ़ने का अनुमान लगाते हैं।
लेकिन नई स्टडी बताती है कि पिघले पानी और महासागर की धाराओं के बीच का यह फीडबैक अभी अधिकांश बड़े मॉडल में पूरी तरह शामिल नहीं है। यदि यह प्रक्रिया वास्तव में पिघलन को तेज़ करती है, तो कुछ अनुमान वास्तविक जोखिम को कम आँक सकते हैं।
अंटार्कटिका में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि आइस शेल्फ पीछे मौजूद विशाल बर्फीली चादरों को रोककर रखती हैं। यदि ये पतली या कमजोर हो जाएँ, तो ग्लेशियर तेज़ी से समुद्र की ओर बह सकते हैं—जिससे वैश्विक समुद्र स्तर बढ़ता है।
एक हालिया नीति‑सार के अनुसार, 2100 तक लगभग 0.5 मीटर वैश्विक समुद्र स्तर वृद्धि लगभग तय मानी जा रही है, भले ही उत्सर्जन पेरिस समझौते के लक्ष्यों के अनुरूप रहे। उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में, यदि पश्चिम अंटार्कटिक हिमचादर के हिस्से तेजी से और स्थायी रूप से टूटते हैं, तो 2100 तक लगभग 2 मीटर वृद्धि की संभावना को भी पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
अन्य हालिया अध्ययनों ने भी दिखाया है कि अंटार्कटिका में बर्फ के नीचे पहुँचने वाला गर्म पानी पिघलन का एक बड़ा कारण है।
पश्चिम अंटार्कटिका पर किए गए शोध में पाया गया कि Circumpolar Deep Water नाम का अपेक्षाकृत गर्म गहरा समुद्री पानी—जो स्थानीय जमाव तापमान से कई डिग्री अधिक हो सकता है—आइस शेल्फ के नीचे तक पहुँचकर उन्हें नीचे से पिघला रहा है।
भूवैज्ञानिक साक्ष्य यह भी दिखाते हैं कि अतीत में भी ऐसा हो चुका है। तलछट के रिकॉर्ड बताते हैं कि लगभग 9,000 वर्ष पहले पूर्वी अंटार्कटिका में पिघलन और महासागरीय धाराओं के बीच इसी तरह का फीडबैक बना था, जिसने आइस शेल्फ के पीछे हटने और अंदरूनी बर्फ के नुकसान को तेज़ कर दिया।
इन अध्ययनों से एक महत्वपूर्ण पैटर्न सामने आता है: जब महासागर की धाराएँ गर्म पानी को बर्फ के नीचे तक पहुँचाने लगती हैं, तो पिघलन अक्सर और तेज़ हो जाती है—कभी‑कभी स्वयं को मजबूत करने वाले चक्र के रूप में।
अंटार्कटिका में होने वाले बदलाव केवल ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहते। जब हिमचादरें पिघलती हैं, तो वह पानी अंततः दुनिया के महासागरों में मिलकर समुद्र स्तर बढ़ाता है।
समुद्र स्तर बढ़ने से तटीय क्षेत्रों में कई खतरे बढ़ते हैं, जैसे:
जलवायु आकलनों के अनुसार, दुनिया भर में सैकड़ों मिलियन लोग निचले तटीय इलाकों में रहते हैं, जहाँ बढ़ता समुद्र स्तर दीर्घकालिक जोखिम पैदा कर सकता है।
नई स्टडी अभी समुद्र स्तर के लिए कोई सटीक नया अनुमान नहीं देती। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण अनिश्चितता को सामने लाती है: अंटार्कटिका के आसपास महासागर और बर्फ के बीच की जटिल प्रक्रियाएँ शायद बर्फ को उतनी तेजी से पिघला सकती हैं जितना कई मौजूदा मॉडल अभी दिखा नहीं पा रहे।
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नई स्टडी के मुताबिक अंटार्कटिका की आइस शेल्फ से निकलने वाला पिघला पानी आसपास के महासागर की धाराओं को बदल देता है, जिससे और अधिक गर्म पानी बर्फ के नीचे पहुँचकर पिघलने की गति बढ़ा सकता है।
नई स्टडी के मुताबिक अंटार्कटिका की आइस शेल्फ से निकलने वाला पिघला पानी आसपास के महासागर की धाराओं को बदल देता है, जिससे और अधिक गर्म पानी बर्फ के नीचे पहुँचकर पिघलने की गति बढ़ा सकता है। क्योंकि आइस शेल्फ पीछे मौजूद विशाल हिमचादरों को थामे रखती हैं, उनके पतले होने से ग्लेशियर तेज़ी से समुद्र में बह सकते हैं और समुद्र स्तर बढ़ सकता है।
अन्य हालिया शोध बताते हैं कि गहरे समुद्र का अपेक्षाकृत गर्म पानी अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे पहुँचकर पिघलन को तेज़ कर रहा है—जो इस जोखिम को और गंभीर बनाता है।