अन्य रिपोर्टों के अनुसार कुल मिलाकर 1985 से अब तक वैश्विक नदियों में ऑक्सीजन लगभग 2.1% कम हो चुकी है।
पहली नज़र में यह गिरावट छोटी लग सकती है, लेकिन पानी में उपलब्ध ऑक्सीजन की मात्रा सीमित होती है। थोड़ी सी कमी भी जलीय जीवों के लिए जीवन‑मरण का अंतर पैदा कर सकती है।
इस समस्या का मुख्य कारण भौतिक विज्ञान का एक सरल नियम है: गर्म पानी ठंडे पानी की तुलना में कम ऑक्सीजन घोल पाता है।
जलवायु परिवर्तन इस प्रक्रिया को कई तरीकों से तेज कर रहा है:
• पानी का औसत तापमान बढ़ रहा है, जिससे ऑक्सीजन की घुलनशीलता कम हो जाती है।
• हीटवेव के दौरान अचानक तापमान बढ़ने से नदियाँ जल्दी ऑक्सीजन तनाव की स्थिति में पहुंच सकती हैं।
• गर्म पानी में जैविक गतिविधि बढ़ जाती है, जिससे जीवाणु और अन्य जीव अधिक ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं।
इन सबका संयुक्त असर यह होता है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति घटती है जबकि खपत बढ़ जाती है, जिससे नदियों में कम‑ऑक्सीजन की स्थिति बनने का जोखिम बढ़ता है।
अध्ययन में पाया गया कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की नदियाँ ऑक्सीजन गिरावट के सबसे बड़े “हॉटस्पॉट” बन रही हैं।
इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए गए हैं।
पहला, उष्णकटिबंधीय नदियाँ पहले से ही गर्म होती हैं। तापमान में थोड़ा सा अतिरिक्त बढ़ाव भी पानी की ऑक्सीजन धारण क्षमता को काफी घटा सकता है।
दूसरा, इन क्षेत्रों के कई पारिस्थितिकी तंत्र पहले ही अपनी तापीय सहनशीलता की सीमा के करीब काम कर रहे हैं। ऐसे में अतिरिक्त गर्मी का झटका जीवों के लिए अधिक खतरनाक हो सकता है।
इसी वजह से दक्षिण एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में भविष्य में मीठे पानी की नदियों पर ऑक्सीजन तनाव ज्यादा देखने को मिल सकता है।
जब पानी में घुली ऑक्सीजन बहुत कम हो जाती है तो हाइपोक्सिया की स्थिति बनती है। ऐसे क्षेत्रों को अक्सर जलीय “डेड ज़ोन” कहा जाता है।
इन परिस्थितियों में:
• मछलियाँ और अन्य जीव दम घुटने से मर सकते हैं
• खाद्य जाल (food web) बाधित हो सकता है
• बड़े पैमाने पर जीवों की मृत्यु की घटनाएँ हो सकती हैं
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले दशकों में नदियों में कम‑ऑक्सीजन घटनाओं की आवृत्ति और अवधि दोनों बढ़ सकती हैं।
उत्तरी अमेरिका और यूरोप की सैकड़ों नदियों पर किए गए एक अन्य विश्लेषण में भी पाया गया कि लगभग 70% नदियों में तापमान बढ़ने के साथ ऑक्सीजन में गिरावट देखी गई।
हालांकि जलवायु परिवर्तन मुख्य कारण है, लेकिन यह अकेला कारक नहीं है। कई अन्य मानवीय गतिविधियाँ भी इस समस्या को गंभीर बना सकती हैं।
भूमि उपयोग में बदलाव, कृषि से बहने वाले पोषक तत्व और शहरी अपवाह (runoff) नदियों में अतिरिक्त जैविक पदार्थ पहुंचाते हैं। जब ये पदार्थ विघटित होते हैं तो सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं, जिससे पानी में ऑक्सीजन और कम हो जाती है।
इसके अलावा:
• बांध और जलाशय पानी के प्रवाह और मिश्रण को बदल सकते हैं
• धीमा या बदला हुआ प्रवाह ऑक्सीजन के पुनःमिश्रण को कम कर सकता है
इन कारकों का प्रभाव हर नदी में अलग‑अलग हो सकता है, लेकिन वे गर्मी से होने वाली ऑक्सीजन गिरावट को और बढ़ा सकते हैं।
नया वैश्विक अध्ययन इस बात को मजबूत करता है कि दुनिया के मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में डीऑक्सीजनेशन तेजी से उभरती समस्या बन रही है।
अब तक झीलों और महासागरों में ऑक्सीजन कमी पर अधिक शोध हुआ था, लेकिन नदियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं—क्योंकि वे जैव विविधता, मत्स्य पालन और अरबों लोगों की पेयजल आपूर्ति का आधार हैं।
यदि वैश्विक तापमान बढ़ता रहा, तो वैज्ञानिकों का अनुमान है कि खासकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की नदियाँ भविष्य में बार‑बार कम‑ऑक्सीजन की घटनाओं का सामना कर सकती हैं, जिससे आने वाले दशकों में मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े बदलाव संभव हैं।
Comments
0 comments