चीन का आकार भी असर को बढ़ा देता है। The Independent ने चीन को दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक निर्यातकों में से एक बताया और रिपोर्ट किया कि उसने पिछले साल करीब 13 अरब डॉलर मूल्य का उर्वरक निर्यात किया था । जब ऐसा बड़ा सप्लायर वैश्विक बाजार से कुछ माल पीछे खींचता है, तो स्पॉट मार्केट यानी तुरंत खरीद वाले बाजार में उपलब्धता कम महसूस होती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर देश को अनिवार्य रूप से भौतिक कमी झेलनी पड़ेगी। लेकिन खरीदारों को महंगे विकल्प, लंबी डिलीवरी या कम सुविधाजनक सप्लायर चुनने पड़ सकते हैं।
भारत की सबसे साफ़ चिंता स्पेशियल्टी उर्वरकों और चीन से जुड़े इनपुट में है। Business Standard ने 2025 में रिपोर्ट किया था कि चीन अक्टूबर से निर्यात प्रतिबंध फिर लागू करने की तैयारी में है, जिससे भारत की स्पेशियल्टी उर्वरक इंडस्ट्री नई सप्लाई चुनौतियों और संभावित कीमत बढ़ोतरी के लिए तैयार हो रही है; इसका असर किसानों तक पहुंच सकता है ।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि चीनी स्पेशियल्टी उर्वरक निर्यात की अस्थायी बहाली से थोड़ी राहत मिली थी, लेकिन निरीक्षण बढ़ने और खेपों में देरी के कारण यह राहत छोटी रह सकती है ।
यानी भारत के लिए मुद्दा दोहरा है: माल समय पर आएगा या नहीं, और आएगा तो किस कीमत पर। अगर चीन से आने वाली खेप धीमी होती है या रुकती है, तो भारतीय खरीदारों को वैकल्पिक सप्लायर ढूंढने, खरीद टालने या ऊंची आयात लागत स्वीकार करने की नौबत आ सकती है। उपलब्ध रिपोर्टिंग से यह तय करना संभव नहीं है कि चीन के ताज़ा कदमों से भारत में कीमत कितनी बढ़ेगी।
डेविड मालपास 2019 से 2023 तक विश्व बैंक के अध्यक्ष रहे। उन्होंने वैश्विक सप्लाई चेन दबाव के बीच चीन से खाद्य पदार्थों और उर्वरक की जमाखोरी रोकने को कहा है । BBC से बातचीत में उन्होंने चीन को लेकर कहा कि उसके पास खाद्य पदार्थों और उर्वरकों का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है
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मालपास की दलील यह है कि जब कोई बहुत बड़ा देश बड़ी मात्रा में भंडार रखता है और साथ ही निर्यात पर नियंत्रण भी रखता है, तो कमी का दबाव बाकी दुनिया पर ज्यादा पड़ सकता है। आयात पर निर्भर देशों के लिए यह दबाव खाद्य कीमतों और खेती की लागत दोनों में दिख सकता है।
भारतीय रिपोर्टिंग में मालपास की टिप्पणियों को बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की शिखर बैठक से ठीक पहले की बातचीत के संदर्भ में रखा गया । इससे उर्वरक और खाद्य भंडार का मुद्दा सिर्फ कमोडिटी बाजार की बहस नहीं रह जाता, बल्कि कूटनीतिक दबाव का विषय भी बनता है।
हालांकि एक जरूरी सावधानी है: जिन सार्वजनिक रिपोर्टों का हवाला है, वे चीन के निर्यात नियंत्रण, घरेलू भंडार जारी करने और भारतीय उद्योग की चिंता की पुष्टि करती हैं। लेकिन वे यह नहीं दिखातीं कि उर्वरक औपचारिक रूप से शिखर बैठक के एजेंडा में शामिल है। रिपोर्टें यह भी नहीं बतातीं कि चीन को कितना भंडार छोड़ना होगा या कितनी जल्दी छोड़ना होगा ताकि वैश्विक कीमतों पर ठोस असर पड़े।
निचोड़ यह है कि चीन अपने किसानों और घरेलू कीमतों की सुरक्षा के लिए उर्वरक सप्लाई भीतर रोक रहा है। लेकिन वैश्विक बाजार में इससे उपलब्धता और तंग हो सकती है। भारत के लिए सबसे बड़ा निकट अवधि जोखिम स्पेशियल्टी उर्वरकों और आयात लागत में है, जबकि मालपास की चेतावनी चीन पर यह दबाव बनाने की कोशिश है कि वह तनावग्रस्त वैश्विक बाजारों में और सप्लाई जाने दे, न कि उसे भंडार में रोके रखे ।
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