यही फर्क निर्णायक है। अलग EU टिप्पणियों में कालास ने कहा कि युद्ध खत्म करने की दिशा में पहला कदम “तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम” होना चाहिए, लेकिन रूस की ओर से इसकी तैयारी के “शून्य संकेत” हैं और मॉस्को अपनी सैन्य मशीन को कम करने के बजाय और बढ़ा रहा है . यानी EU का आकलन यह नहीं कि रूस खत्म हो चुका है; बात यह है कि दबाव ने पुतिन को अधिक असुरक्षित बनाया है, पर अभी इतना नहीं कि वे वास्तविक शांति की ओर बढ़ें।
कालास की दलील सैन्य हकीकत को बातचीत की रणनीति से जोड़ती है। उनके बयानों पर रिपोर्टिंग ने रूसी युद्धक्षेत्र नुक़सान, रूस के भीतर गहराई तक यूक्रेनी हमलों और मॉस्को की अपेक्षाकृत फीकी सैन्य परेड को संकेत माना कि युद्ध की दिशा बदल रही है . EU की आधिकारिक लाइन भी यही है कि यूक्रेन को समर्थन और रूस पर दबाव जारी रखा जाए
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नीति का तर्क सीधा है: अगर मॉस्को अपने लक्ष्य सैन्य ताकत से नहीं थोप पा रहा, तो यूरोप नहीं चाहता कि वही लक्ष्य किसी कमजोर समझौते के जरिए रूस को मिल जाएं। कालास ने इसे ऐसे रखा है कि स्थिति को वहां से आगे ले जाना होगा जहां रूस “बातचीत का दिखावा” करता है, वहां तक जहां उसे सचमुच बातचीत की जरूरत पड़े .
कालास का संदेह रूसी शब्दों और रूसी आचरण के बीच की खाई से आता है। मई में प्रेस टिप्पणियों में उन्होंने पुतिन के परेड के आसपास किए गए युद्धविराम प्रस्ताव को “बहुत निंदक” बताया, यह कहते हुए कि इसका मकसद परेड की रक्षा करना था, जबकि रूस यूक्रेन में नागरिकों पर हमले कर रहा था . उन्होंने इसकी तुलना यूक्रेन की बिना शर्त युद्धविराम मानने या प्रस्तावित करने की तत्परता से की
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इसीलिए EU बार-बार एक ही कसौटी पर लौटता है: युद्ध खत्म करने की पहली शर्त तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम होनी चाहिए . जब तक मॉस्को ऐसा युद्धविराम स्वीकार नहीं करता, कालास की स्थिति यह है कि शांति की भाषा को वास्तविक शांति-इरादे का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
रूस के अंदर घरेलू असंतोष को अक्सर पुतिन पर दबाव के संभावित स्रोत के रूप में देखा जाता है। लेकिन उपलब्ध स्रोतों में मापने योग्य रूसी जनमत, संगठित असंतोष या घरेलू राजनीतिक दबाव पर उतना ठोस प्रमाण नहीं है, जितना सैन्य और कूटनीतिक संकेतों पर है। जिन संकेतों का रिकॉर्ड सामने है, वे रूसी युद्धक्षेत्र नुक़सान, रूस के भीतर यूक्रेनी हमले, अपेक्षाकृत छोटी परेड और EU का यह आकलन हैं कि रूस अपनी सैन्य कोशिश घटा नहीं रहा, बल्कि बढ़ा रहा है .
इसलिए घरेलू दबाव को सावधानी से पढ़ना चाहिए। वह व्यापक संदर्भ का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इन स्रोतों के आधार पर उसे EU की मौजूदा रणनीति का मुख्य स्तंभ बनाना सही नहीं होगा।
11 मई को यूक्रेनी बच्चों के मामले में लगाए गए EU प्रतिबंधों ने दबाव अभियान को युद्धक्षेत्र से आगे कानूनी और मानवीय मोर्चे तक फैला दिया। इन उपायों में 16 व्यक्तियों और सात संगठनों को निशाना बनाया गया, जिन पर यूक्रेनी बच्चों के गैरकानूनी निर्वासन, जबरन स्थानांतरण और जबरन समायोजन में भूमिका के आरोप हैं . QNA के अनुसार, EU ने कहा कि फरवरी 2022 से 20,500 से अधिक यूक्रेनी बच्चों को निर्वासित किया गया है, और प्रतिबंधों के दायरे में वे संस्थाएं भी आईं जो नाबालिगों के वैचारिक प्रशिक्षण और सैन्यीकरण से जुड़ी बताई गईं
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कालास ने यूक्रेनी बच्चों के निर्वासन और जबरन स्थानांतरण को रूस के युद्ध के “सबसे बुरे अपराधों” में से एक बताया . उन्होंने प्रतिबंधों को उस उच्च-स्तरीय कार्यक्रम से भी जोड़ा, जिसका फोकस था कि यूक्रेनी बच्चों को वापस कैसे लाया जाए
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इसका मतलब किसी भी भविष्य की शांति प्रक्रिया के लिए बड़ा है। EU संकेत दे रहा है कि समझौता केवल जमीन, सीमा-रेखा या युद्धविराम तक सीमित नहीं रह सकता; जवाबदेही और बच्चों की वापसी भी यूरोप के दबाव एजेंडा का हिस्सा हैं .
कालास ने यह भी कहा है कि EU उन रियायतों की सूची तैयार कर रहा है जिन्हें वह दीर्घकालिक शांति के लिए रूस की ओर से जरूरी मानता है, जबकि अमेरिका-नेतृत्व वाली बातचीत में खास प्रगति नहीं दिख रही थी . यह महत्वपूर्ण संकेत है: यूरोप केवल वार्ताओं पर प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता, बल्कि यह तय करने में भूमिका चाहता है कि टिकाऊ समझौते के लिए मॉस्को से क्या अपेक्षित होगा।
उपलब्ध स्रोत उन रियायतों की पूरी सार्वजनिक सूची नहीं देते, इसलिए उनके विवरण को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया जाना चाहिए। लेकिन दिशा साफ है: यूक्रेन का समर्थन, रूस पर दबाव, बिना शर्त युद्धविराम की मांग और ऐसे बातचीत सिद्धांत जिनमें केवल यूक्रेन से समझौते की उम्मीद न हो, बल्कि रूस की जिम्मेदारियां भी तय हों .
कालास का संदेश यह नहीं है कि “रूस हार चुका है।” उनका संदेश है कि “ऐसे बातचीत मत कीजिए जैसे सारे पत्ते पुतिन के हाथ में हों।” उनकी दलील के मुताबिक युद्धक्षेत्र का दबाव, पुतिन के शांति संकेतों पर संदेह, यूक्रेनी बच्चों पर नए प्रतिबंध और भविष्य की शांति शर्तें तय करने की यूरोपीय कोशिश—सब एक ही रणनीति की ओर इशारा करते हैं: किसी भी गंभीर समझौते से पहले यूक्रेन की स्थिति मजबूत की जाए .
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