रिपोर्टों में कहा गया है कि ऐसी बैठकें लॉस एंजेलिस, ब्रसेल्स और पेरिस में हो चुकी हैं। अगली बैठक लंदन में Writers’ Guild of Great Britain यानी ब्रिटेन के पेशेवर लेखकों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन से जुड़े लोगों के साथ प्रस्तावित बताई गई है। लंदन बैठक का विषय “यूरोप में बदलती सुरक्षा स्थिति” बताया गया है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, यह पहल नाटो के public diplomacy division—यानी जन-कूटनीति से जुड़े प्रभाग—के जरिए समन्वित की जा रही है और इसका मकसद फिल्म व टीवी उद्योग से संबंध बनाना है। वहीं, The Guardian द्वारा देखे गए बताए जा रहे नाटो के एक ईमेल में कहा गया कि पिछली बैठकों ने प्रतिभागियों को “तीन अलग-अलग प्रोजेक्ट” शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
सबसे बड़ा मुद्दा गोपनीयता है। अगर बैठकें सार्वजनिक नहीं हैं, तो बाहर के लोग नहीं जान सकते कि उनमें क्या बताया गया, कौन-सी सामग्री साझा हुई, क्या सलाह दी गई और बाद में किसी फिल्म या टीवी प्रोजेक्ट पर उसका कितना असर पड़ा।
इसी वजह से आलोचकों को शक है कि यह केवल वैश्विक हालात समझाने की कवायद नहीं, बल्कि फिल्म और टीवी सामग्री को प्रभावित करने की कोशिश भी हो सकती है। रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ प्रतिभागियों ने इस पहल को कंटेंट पर प्रभाव डालने की कोशिश और प्रोपेगैंडा के रूप में देखा है।
किसी सैन्य या सुरक्षा संस्था का पत्रकारों, शोधकर्ताओं या नीति-विशेषज्ञों को ब्रीफ करना अलग बात है। लेकिन पटकथा लेखक और निर्माता केवल तथ्य नहीं बताते; वे तय करते हैं कि कहानी में खतरा कैसे दिखेगा, कौन भरोसेमंद लगेगा, कौन विरोधी होगा और दर्शक किसके साथ भावनात्मक रूप से खड़े होंगे।
इसलिए नाटो जैसे सैन्य गठबंधन का रचनाकारों से संपर्क, भले वह सीधे स्क्रिप्ट बदलने जैसा न हो, फिर भी संवेदनशील माना जाता है। आम दर्शक किसी फिल्म या सीरीज को स्वतंत्र रचनात्मक काम समझकर देखते हैं। अगर उसके पीछे सुरक्षा-राजनीति से जुड़ी संस्था की अनदेखी भूमिका हो, तो वह प्रचार जैसा लग सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ आमंत्रित लोगों को लगा कि उनसे नाटो के लिए “प्रोपेगैंडा में योगदान” करने को कहा जा रहा है।
नाटो से जुड़े बताए गए ईमेल में यह दावा कि पिछली बैठकों से “तीन अलग-अलग प्रोजेक्ट” प्रेरित हुए, आलोचना का अहम कारण है।
अगर बैठकें केवल सामान्य पृष्ठभूमि चर्चा होतीं, तो उनका किसी रचनात्मक प्रोजेक्ट से सीधा रिश्ता कमजोर दिखता। लेकिन जब यह कहा जाए कि बैठकों से प्रोजेक्ट शुरू हुए, तो सवाल उठता है कि क्या इस बातचीत ने कहानी की दिशा, विषय या दृष्टिकोण को प्रभावित किया।
इसी संदर्भ में पटकथा लेखक Alan O’Gorman ने The Guardian से कहा कि इसे सकारात्मक अवसर की तरह पेश करना उन्हें “tone-deaf and crazy” लगा।
यह विवाद अचानक शून्य में पैदा नहीं हुआ। सुरक्षा संस्थानों और लोकप्रिय संस्कृति के बीच संबंधों पर पहले से चर्चा होती रही है।
उदाहरण के लिए, 2024 में CSIS ने “Hollywood Goes to NATO: Telling the Story of the Alliance” नामक कार्यक्रम में हॉलीवुड पटकथा लेखकों से पूछा कि नाटो की भविष्य की “कहानी” कैसे कही जानी चाहिए। यह कार्यक्रम मौजूदा बंद-दरवाजा बैठकों का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह दिखाता है कि सुरक्षा नीति से जुड़े लोग लोकप्रिय संस्कृति के कहानीकारों को जनता तक पहुंचने वाले प्रभावशाली माध्यम के रूप में देखते हैं।
यही पृष्ठभूमि आलोचकों को और सतर्क बनाती है। उन्हें लगता है कि मामला केवल सूचना साझा करने का नहीं, बल्कि नाटो के उद्देश्यों और मूल्यों को मनोरंजन की भाषा में सामान्य बनाने का हो सकता है।
सावधानी जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्टों से यह नहीं कहा जा सकता कि नाटो ने किसी स्क्रिप्ट को सीधे बदलवाया, किसी फिल्म को पैसे देकर खास चित्रण की मांग की, या किसी तैयार作品 में विशेष संदेश डालने को कहा।
अभी ठोस रूप से जो बात सामने है, वह यह है कि नाटो फिल्म और टीवी पेशेवरों से बंद कमरे में मिल रहा है; लॉस एंजेलिस, ब्रसेल्स और पेरिस में बैठकें हो चुकी बताई गई हैं; लंदन बैठक प्रस्तावित है; और एक ईमेल में पिछली बैठकों से “तीन प्रोजेक्ट” प्रेरित होने की बात कही गई है।
इसलिए बेहतर निष्कर्ष यह नहीं है कि “नाटो ने प्रोपेगैंडा फिल्में बना दी हैं।” सही बात यह है कि गोपनीयता, सैन्य गठबंधन की भूमिका और रचनात्मक प्रोजेक्ट पर संभावित असर—इन तीनों के कारण प्रोपेगैंडा का आरोप लग रहा है।
यह बहस केवल इस बात की नहीं है कि नाटो ने फिल्मकारों से बात की या नहीं। लोकतांत्रिक समाजों में संस्थाएं कलाकारों, पत्रकारों और शोधकर्ताओं से बात करती हैं। असली सवाल यह है कि वह संपर्क कितना पारदर्शी है और रचनाकार कितने स्वतंत्र हैं।
जब तक ये बातें साफ नहीं होतीं, संदेह बना रहेगा:
यही इस विवाद की मूल बात है। समस्या केवल “सैन्य गठबंधन और संस्कृति” के संपर्क की नहीं, बल्कि उस संपर्क के अदृश्य रहने की है। जब दर्शक किसी कहानी को स्वतंत्र मनोरंजन समझते हैं, लेकिन उसके पीछे राजनीतिक-सुरक्षा संदेश गढ़ने की संभावना दिखती है, तभी उसे प्रोपेगैंडा कहे जाने की जमीन बनती है।