एक और बड़ा कारण समुद्री बीमा है।
संघर्ष के दौरान होर्मुज़ के आसपास चलने वाले जहाज़ों के लिए युद्ध‑जोखिम बीमा (war‑risk insurance) की कीमतें तेजी से बढ़ीं—जहां पहले यह कार्गो मूल्य के 1% से कम होती थीं, वहीं संकट के दौरान यह लगभग 3% से 10% तक पहुंच गईं।
कई जहाज़ मालिकों और चार्टर कंपनियों के लिए इतनी ऊंची प्रीमियम दरें इस मार्ग को आर्थिक रूप से जोखिम भरा बना देती हैं। कुछ बीमा कंपनियों ने कवरेज रद्द या दोबारा महंगी दरों पर जारी की, जिससे जहाज़ों ने खाड़ी में प्रवेश ही नहीं किया।
जब तक बीमा बाजार स्थिर नहीं होता, इस मार्ग पर टैंकरों की संख्या सीमित रह सकती है।
संकट के दौरान कई बड़ी वैश्विक शिपिंग और लॉजिस्टिक्स कंपनियों ने अपने ऑपरेशन रोक दिए या कम कर दिए। कुछ कंपनियों ने खाड़ी क्षेत्र की सेवाएं पूरी तरह बंद कर दीं, जबकि अन्य ने जोखिम अधिभार (risk surcharge) लगा दिया।
ऐसे मामलों में कंपनियां आमतौर पर राजनीतिक समझौते के बाद भी तुरंत वापस नहीं लौटतीं। वे पहले लंबे समय तक स्थिर स्थिति देखना चाहती हैं। इसका मतलब यह है कि भौतिक रूप से जलमार्ग खुलने के बावजूद सामान्य तेल व्यापार के लिए जरूरी जहाज़ क्षमता तुरंत उपलब्ध नहीं होती।
सुरक्षा भी पुनर्बहाली की गति को प्रभावित कर सकती है। विश्लेषकों और अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि जलमार्ग में बारूदी सुरंगें या अन्य खतरे मौजूद हैं, तो उन्हें हटाने में काफी समय—संभवतः महीनों—लग सकते हैं।
हालांकि इस समयसीमा पर अलग‑अलग अनुमान हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि शिपिंग कंपनियां और बीमाकर्ता आम तौर पर तब तक पूरी गतिविधि बहाल नहीं करते जब तक सुरक्षित मार्ग की पुष्टि न हो जाए।
क्योंकि संकट कई महीनों तक चला, एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने अपने तेल स्रोत बदलना शुरू कर दिया है।
भारत इसका स्पष्ट उदाहरण है। खाड़ी से आपूर्ति घटने पर भारतीय रिफाइनरियों ने रूस, पश्चिम अफ्रीका और वेनेजुएला जैसे वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाई। मई में वेनेजुएला ने भारत को लगभग 4.17 लाख बैरल प्रति दिन तेल भेजा, जिससे वह उस अवधि में भारत का तीसरा सबसे बड़ा सप्लायर बन गया।
हालांकि यह विकल्प सीमित है। वेनेजुएला का तेल अधिक भारी (heavy crude) होता है और इसे केवल कुछ जटिल रिफाइनरियां ही कुशलता से प्रोसेस कर सकती हैं, इसलिए यह पूरे सिस्टम में मध्य‑पूर्वी तेल की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता।
क्षेत्र के बड़े तेल आयातकों के लिए सबसे बड़ा असर स्थायी कमी नहीं बल्कि समय और लागत पर पड़ेगा।
भले ही कूटनीतिक समझौते से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ फिर से खुल जाए, एशियाई देशों को कुछ समय तक इन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है:
सरल शब्दों में कहें तो राजनीतिक समझौता समुद्री रास्ता खोल सकता है—लेकिन उस रास्ते पर निर्भर पूरे वैश्विक तेल लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को सामान्य होने में अभी समय लग सकता है।
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