चीन में 2025 में जीन एडिटिंग के दो अलग अलग परीक्षणों में दो बच्चों की मौत हो गई, जिसका कारण थेरेपी देने के लिए इस्तेमाल किए गए वायरल वेक्टर से हुई गंभीर इम्यून रिएक्शन थी। पहला मामला: छह साल की बच्ची 'मेई' को दुर्लभ न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर के लिए दिमाग में बेस एडिटिंग थेरेपी दी गई, जिसके एक हफ्ते बाद उसकी मौत हो ग...
शोध उत्तर

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जीन-एडिटिंग थेरेपी में दिमाग और नर्वस सिस्टम की अनुवांशिक बीमारियों के इलाज की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन चीन में हाल ही में हुई दो दुखद घटनाओं ने एक कड़वी सच्चाई उजागर कर दी है: यह विज्ञान अभी इंसानों पर परीक्षण के लिए तैयार नहीं है।
2025 में दो अलग-अलग प्रयोगात्मक जीन-एडिटिंग उपचारों के दौरान दो बच्चों की मौत हो गई। विशेषज्ञों का कहना है कि इन मौतों को रोका जा सकता था। आइए समझते हैं कि आखिर हुआ क्या, जोखिम इतने अधिक क्यों हैं, और सीएनएस (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र) के लिए जीन एडिटिंग के सुरक्षित इंसानी परीक्षणों में कितना समय लग सकता है।
मार्च 2025 में, छह साल की एक बच्ची (जिसे 'मेई' नाम दिया गया) दुनिया की पहली ऐसी मरीज बनी, जिसका दिमाग बेस-एडिटिंग थेरेपी से ठीक किया गया । उसे स्नाइडर्स-ब्लोक-कैम्प्यू सिंड्रोम नामक एक दुर्लभ न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर था। उसके माता-पिता ने शंघाई के शिन्हुआ अस्पताल में इस प्रयोगात्मक उपचार के लिए लगभग 8.6 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग 7.2 करोड़ रुपये) जुटाए थे
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डॉक्टरों ने उसकी रीढ़ की हड्डी के तरल पदार्थ में खरबों एडेनो-असोसिएटेड वायरस (AAV) बेस एडिटर इंजेक्ट किए। सात दिन बाद, उसकी मौत 'थ्रोम्बोटिक माइक्रोएंजियोपैथी' नामक गंभीर बीमारी से हो गई, जो वायरल वेक्टर के कारण हुई एक गंभीर इम्यून और संवहनी प्रतिक्रिया थी ।
शोधकर्ताओं ने इस मौत को कभी सार्वजनिक नहीं किया। साइंस पत्रिका और रिट्रैक्शन वॉच की एक जांच, जो जुलाई 2026 में प्रकाशित हुई, ने इस घटना को एक साल से अधिक समय बाद उजागर किया । इसके बाद शंघाई जिओ टोंग यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन ने एक व्यापक जांच शुरू की
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चीन में एक अलग परीक्षण में, ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (डीएमडी) से पीड़ित एक बच्चे की मौत हो गई। यह इलाज शंघाई स्थित ह्यूडाजीन थेरेप्यूटिक्स (HuidaGene Therapeutics) ने विकसित किया था । कंपनी ने अगस्त 2025 में हुई इस मौत का कारण एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (तीव्र श्वसन संकट सिंड्रोम) बताया, जो थेरेपी के प्रति गंभीर इम्यून रिएक्शन का हिस्सा था
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दोनों मौतों का कारण एक ही था: वायरल वेक्टर डिलीवरी सिस्टम (AAV) ने पूरे शरीर में इतनी भयानक इम्यून रिएक्शन पैदा कर दी कि जानवरों पर किए गए अध्ययनों में इसका सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सका था।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में एडजंक्ट प्रोफेसर और दिमागी विज्ञान के व्यावसायीकरण में एक प्रमुख हस्ती कैरोली निकोलिच ने कहा है कि सीएनएस जीन-एडिटिंग थेरेपी के सुरक्षित इंसानी परीक्षणों में पाँच साल तक लग सकते हैं ।
निकोलिच ने तीन मुख्य समस्याओं की पहचान की है जिन्हें हल किया जाना जरूरी है :
"ये तकनीकें जानवरों के प्रयोगों के लिए काफी हद तक स्थापित हैं, लेकिन मानवीय अध्ययनों के लिए वे वास्तव में पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं," निकोलिच ने एक विस्तृत साक्षात्कार में कहा ।
निकोलिच का 5 साल का अनुमान व्यापक विश्लेषणों से मेल खाता है। 2025 की एक समीक्षा ने नोट किया कि सीएनएस के लिए CRISPR-आधारित नैदानिक अनुप्रयोगों को 5-10 साल दूर बताया गया है । नेचर मेडिसिन में प्रकाशित उद्योग ट्रैकिंग से पता चलता है कि 2025 में सक्रिय जीन थेरेपी विकास कार्यक्रमों की कुल संख्या में गिरावट आई है, जो पिछले ऊपर की प्रवृत्ति को उलट देता है
। 2025 में कई परीक्षणों को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था
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चीन में हुई मौतों ने साबित कर दिया है कि नर्वस सिस्टम के लिए मौजूदा जीन-एडिटिंग दृष्टिकोणों में जानलेवा जोखिम हैं - खासकर वेक्टर-जनित इम्यून प्रतिक्रियाओं से - जिन्हें जानवरों के मॉडल पहचानने में विफल रहे। इंसानी परीक्षणों के लिए जिम्मेदारी से आगे बढ़ने से पहले इस क्षेत्र को प्रणालीगत ऑफ-टारगेट प्रभावों की गहरी जैविक समझ और सुरक्षित डिलीवरी तकनीकों की जरूरत है। विश्वसनीय विशेषज्ञ अनुमान कम से कम कुछ और वर्षों के प्रीक्लिनिकल काम की ओर इशारा करते हैं।
तब तक, दिमाग के लिए जीन एडिटिंग एक वादा बनी रहेगी - कोई इलाज नहीं।
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चीन में 2025 में जीन एडिटिंग के दो अलग अलग परीक्षणों में दो बच्चों की मौत हो गई, जिसका कारण थेरेपी देने के लिए इस्तेमाल किए गए वायरल वेक्टर से हुई गंभीर इम्यून रिएक्शन थी।
चीन में 2025 में जीन एडिटिंग के दो अलग अलग परीक्षणों में दो बच्चों की मौत हो गई, जिसका कारण थेरेपी देने के लिए इस्तेमाल किए गए वायरल वेक्टर से हुई गंभीर इम्यून रिएक्शन थी। पहला मामला: छह साल की बच्ची 'मेई' को दुर्लभ न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर के लिए दिमाग में बेस एडिटिंग थेरेपी दी गई, जिसके एक हफ्ते बाद उसकी मौत हो गई।
दूसरा मामला: ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से पीड़ित एक बच्चे की मौत ह्यूडाजीन थेरेप्यूटिक्स के परीक्षण में हुई।