भारत में इस मौसमीय झटके का सबसे बड़ा रास्ता मानसून है। सामान्य से कम बारिश और अधिक तापमान बारिश-निर्भर खरीफ फसलों, खासकर चावल और मक्का, को प्रभावित कर सकते हैं। इससे बुवाई में देरी, पैदावार में कमी और किसानों की आय पर दबाव बढ़ सकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मौसमी पूर्वानुमान में भारतीय उपमहाद्वीप में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बड़े हिस्से में सामान्य से अधिक तापमान का भी अनुमान है।
भारत इस जोखिम के दौर में पहले ही ऊंची खाद्य महंगाई का सामना कर रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में खाद्य महंगाई 5.52% रही। इसी दौरान ग्रामीण महंगाई 4.84% और शहरी महंगाई 3.96% दर्ज की गई। अगर फसल कमजोर रहती है, तो परिवारों की वास्तविक क्रय-शक्ति पर असर पड़ेगा। भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी चुनौती बढ़ेगी, क्योंकि खाद्य कीमतों का दबाव आर्थिक विकास को सहारा देने वाली नीतियों और व्यापक महंगाई को नियंत्रित करने के बीच संतुलन कठिन बना सकता है।
इसका सामान्य क्रम कुछ ऐसा हो सकता है:
इस तरह अल नीनो एक साथ आपूर्ति-संकट और लागत-संकट पैदा कर सकता है। उर्वरक की कमी और महंगा डीजल खराब मौसम की भरपाई को और मुश्किल बनाते हैं। व्यापार प्रतिबंध या स्थानीय मुद्रा में गिरावट होने पर वैश्विक भंडार पर्याप्त रहने के बावजूद स्थानीय कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। फसल आपूर्ति की चिंताओं के साथ उर्वरक और ईंधन में व्यवधान की खबरें भी सामने आई हैं।
इसका सबसे संभावित नतीजा संवेदनशील अर्थव्यवस्थाओं में विकास की रफ्तार का धीमा होना है, न कि अपने-आप पूरी दुनिया में मंदी आ जाना। सबसे अधिक दबाव ग्रामीण परिवारों, खाद्य आयात पर निर्भर देशों और उन उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के भोजन पर खर्च होता है।
पाम ऑयल बाजार पर दो दिशाओं से दबाव बन रहा है—इंडोनेशिया की घरेलू जैव-ईंधन नीति और सूखे का देर से दिखने वाला असर।
इंडोनेशिया का B50 बायोडीजल नियम जुलाई 2026 में लागू हुआ। इसके चलते घरेलू पाम ऑयल खपत 11% बढ़कर 2.53 करोड़ मीट्रिक टन होने और 2026-27 में निर्यात के लिए उपलब्ध आपूर्ति घटकर 2.31 करोड़ टन रहने का अनुमान है। देश की फसल का बड़ा हिस्सा ईंधन में इस्तेमाल होने से अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए उपलब्ध मात्रा कम होगी और खाद्य तेल बाजार पर कीमतों का दबाव बढ़ सकता है।
मौसम का असर बाद में दिखाई देगा। मलेशिया की SD Guthrie का अनुमान है कि अल नीनो 2027 और 2028 में पाम ऑयल उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। 2026 का उत्पादन काफी हद तक सामान्य रहने की उम्मीद है, क्योंकि सूखे का असर पाम के पेड़ों की पैदावार पर आमतौर पर 12 से 16 महीने की देरी से आता है। खाद्य नीति और बाजार के लिए यह देरी महत्वपूर्ण है: बागानों में वास्तविक नुकसान दिखने से पहले ही कीमतें भविष्य की कमी की आशंका पर बढ़ सकती हैं।
B50 की बढ़ती मांग और सूखे के मेल से पाम ऑयल का संतुलन और कड़ा होने तथा वैश्विक भंडार घटने की चिंता बढ़ी है। एक बाजार रिपोर्ट में अमेरिकी कृषि विभाग के ऐसे अनुमान का उल्लेख है कि 2026-27 सत्र में वैश्विक पाम ऑयल भंडार नौ साल के निचले स्तर तक गिर सकता है। आयात-निर्भर देशों के उपभोक्ताओं को इसका असर खाना पकाने के तेल और वनस्पति तेल से बने अन्य उत्पादों की कीमतों में महसूस हो सकता है।
लगभग रिकॉर्ड स्तर के भंडार और सरकारी स्टॉक अंतरराष्ट्रीय अनाज आपूर्ति को संभालने में मदद कर सकते हैं। भारत में गेहूं और चावल का भंडार रणनीतिक जरूरत से ऊपर बताया गया है, जिससे कीमतों में तेज उछाल के खिलाफ कुछ सुरक्षा मिल सकती है।
लेकिन भंडार और सस्ता भोजन एक ही बात नहीं हैं। स्टॉक तभी मददगार होगा जब सरकारें उसे बाजार में जारी करें, आयात प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच सके, परिवहन व्यवस्था चालू रहे और व्यापार नीति आपूर्ति को न रोके। निर्यात प्रतिबंध, घबराहट में खरीदारी, मुद्रा का कमजोर होना और असमान वितरण पर्याप्त वैश्विक भंडार को भी स्थानीय कमी में बदल सकते हैं।
इसलिए सबसे संभावित तस्वीर एक समान वैश्विक संकट की नहीं, बल्कि अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग असर की है—सूखे से प्रभावित जिलों और कम आय वाले आयातक देशों में गंभीर कमी या महंगा भोजन, जबकि अन्य क्षेत्रों में आपूर्ति पर्याप्त रह सकती है।
गरीब परिवार, सिंचाई से वंचित छोटे किसान, संघर्ष प्रभावित समुदाय और खाद्य आयात पर निर्भर देश बढ़ती कीमतों को सहने की स्थिति में सबसे कम होते हैं। समय रहते चेतावनी, पहले से नकद या खाद्य सहायता, बीज और उर्वरक की उपलब्धता, सिंचाई सहयोग तथा खुले व्यापार से नुकसान कम किया जा सकता है।
2027 के अंत तक 4.9 करोड़ अतिरिक्त लोगों के गंभीर खाद्य असुरक्षा की स्थिति में पहुंचने का अक्सर उद्धृत अनुमान यहां उपलब्ध साक्ष्यों से स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं होता। इसलिए इसे पक्के पूर्वानुमान के बजाय अप्रमाणित परिदृश्य माना जाना चाहिए।
उपलब्ध साक्ष्य चार प्रमुख संभावित नतीजों की ओर इशारा करते हैं:
दुनिया भर में अनाज की व्यापक कमी की तुलना में स्थानीय कमी और भोजन की सामर्थ्य का संकट अधिक संभावित है। खतरा तब काफी बढ़ जाएगा जब लंबा सूखा उर्वरक और डीजल की कमी, निर्यात प्रतिबंध या मानवीय सहायता में देरी के साथ एक ही समय पर आए।