अफ्रीका पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े बिजली अंतर (electricity gap) का सामना कर रहा है।
इस स्थिति में जब डीज़ल या अन्य ईंधन आधारित बिजली उत्पादन महंगा हो जाता है, तो सौर ऊर्जा—खासकर रूफटॉप और छोटे‑छोटे स्थानीय सिस्टम—नई बिजली क्षमता जोड़ने का सबसे तेज़ और सस्ता तरीका बन जाते हैं।
भौगोलिक दृष्टि से भी अफ्रीका सौर ऊर्जा के लिए आदर्श है। महाद्वीप के पास दुनिया के लगभग 60% सर्वश्रेष्ठ सौर संसाधन हैं, फिर भी वर्तमान में कुल बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी सिर्फ करीब 3% है।
अफ्रीका की बढ़ती मांग उसी समय सामने आई है जब चीन का सौर उद्योग अत्यधिक उत्पादन क्षमता (overcapacity) से जूझ रहा है।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोलर उपकरण निर्माता है और पिछले कुछ वर्षों में वहां उत्पादन क्षमता इतनी तेज़ी से बढ़ी कि वैश्विक मांग से कहीं ज्यादा हो गई। इससे कंपनियों के बीच कड़ी कीमत प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।
इसका नतीजा यह हुआ कि:
यहीं पर अफ्रीका और चीन की जरूरतें एक‑दूसरे से मेल खा गईं:
हाल के व्यापार आंकड़ों के अनुसार, जिन देशों में बिजली संकट ज्यादा गंभीर है, वहीं सोलर पैनलों की खरीद सबसे तेजी से बढ़ी है। खास तौर पर:
इन देशों में सरकारें, कंपनियां और घर‑परिवार सभी सौर सिस्टम लगा रहे हैं ताकि अस्थिर ग्रिड पर निर्भरता कम की जा सके।
हालांकि सोलर आयात तेजी से बढ़ रहे हैं, फिर भी पूरे अफ्रीका की बिजली व्यवस्था में सौर ऊर्जा का हिस्सा अभी छोटा है। बड़े बिजली तंत्र वाले देश—जैसे दक्षिण अफ्रीका और मिस्र—अब भी पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर काफी निर्भर हैं।
फिर भी रफ्तार उल्लेखनीय है। अफ्रीका के कई देशों में अब कुल बिजली का 10% से ज्यादा हिस्सा सौर ऊर्जा से आने लगा है, जो बताता है कि एक बार निवेश शुरू होने पर वृद्धि बहुत तेज़ हो सकती है।
अफ्रीका में चीनी सोलर पैनलों की रिकॉर्ड मांग सिर्फ एक क्षेत्रीय कहानी नहीं है। यह वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में हो रहे बड़े बदलाव का संकेत भी है।
इन सबके मेल से अफ्रीका में सौर ऊर्जा की तैनाती तेज़ हो रही है। आज भले ही सौर बिजली का हिस्सा छोटा हो, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा और गिरती तकनीकी लागतें संकेत देती हैं कि आने वाले वर्षों में अफ्रीका की ऊर्जा प्रणाली में सौर ऊर्जा कहीं अधिक बड़ी भूमिका निभा सकती है।
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