इसका परिणाम यह है कि दुनिया के कई प्रमुख बाज़ारों में यील्ड लगभग एक साथ बढ़ रही हैं—जो आमतौर पर कम ही देखने को मिलता है।
अमेरिका में सरकारी ट्रेज़री बॉन्ड की यील्ड इस बिकवाली के दौरान लगभग एक साल के उच्च स्तर के आसपास पहुँच गई।
अमेरिकी ट्रेज़री यील्ड का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि यही पूरे वित्तीय सिस्टम की आधार दर मानी जाती है। जब यह बढ़ती है, तो कई चीज़ें महंगी हो जाती हैं:
जब सुरक्षित सरकारी बॉन्ड पर ही बेहतर रिटर्न मिलने लगता है, तो कई निवेशक शेयरों से पैसा निकालकर बॉन्ड में लगाने लगते हैं। इससे शेयर बाज़ार में उतार‑चढ़ाव बढ़ जाता है।
जापान का बॉन्ड बाज़ार खास तौर पर ध्यान में है, क्योंकि दशकों तक वहाँ बेहद कम ब्याज दरों का माहौल रहा।
हाल के महीनों में जापानी सरकारी बॉन्ड—खासकर लंबी अवधि वाले—की यील्ड में तेज़ उछाल देखा गया है। यह उस पुराने दौर से बड़ा बदलाव है और वैश्विक बाज़ारों में भी असर डाल सकता है।
जापान दुनिया के सबसे बड़े विदेशी बॉन्ड निवेशकों में से एक है। अगर घरेलू यील्ड बढ़ती है, तो जापानी निवेशक विदेशों से पैसा निकालकर अपने देश के बॉन्ड में लगा सकते हैं। इससे वैश्विक बाज़ारों में भी यील्ड पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
इसका असर कई स्तरों पर पड़ता है:
ब्रिटेन पहले से ही लगातार महंगाई के दबाव का सामना कर रहा है, इसलिए बढ़ती यील्ड अर्थव्यवस्था और हाउसिंग मार्केट दोनों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।
बॉन्ड यील्ड में उछाल का असर एशियाई शेयर बाज़ारों में भी साफ दिखाई दिया।
दक्षिण कोरिया का प्रमुख KOSPI इंडेक्स तेज़ी से गिरा। KOSPI 200 फ्यूचर्स में 5% से अधिक गिरावट आने पर कोरिया एक्सचेंज में लगातार दूसरे सत्र में “सेल‑साइडकार” ट्रिगर करना पड़ा।
साइडकार एक सुरक्षा तंत्र है जो अत्यधिक उतार‑चढ़ाव के समय फ्यूचर्स ट्रेडिंग को थोड़े समय के लिए रोक देता है, ताकि बाज़ार में घबराहट कम की जा सके।
इसी दौरान कोरियाई वॉन भी कमजोर होकर लगभग 1,500 वॉन प्रति डॉलर के स्तर के पास पहुँच गया और विदेशी निवेशकों ने जोखिम वाले एसेट्स में अपनी हिस्सेदारी घटाई।
आम तौर पर जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती हैं, तो शेयर बाज़ारों पर दबाव बढ़ जाता है। इसके कुछ मुख्य कारण हैं:
टेक्नोलॉजी और हाई‑ग्रोथ कंपनियों वाले बाज़ार—जैसे दक्षिण कोरिया का सेमीकंडक्टर‑प्रधान इंडेक्स—ब्याज दरों में बदलाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
निवेशकों की एक बड़ी चिंता यह भी है कि दुनिया कहीं स्टैगफ्लेशन की ओर तो नहीं बढ़ रही—जहाँ आर्थिक विकास धीमा हो जाए लेकिन महंगाई ऊँची बनी रहे।
अगर युद्ध और ऊर्जा कीमतों के कारण महंगाई बनी रहती है, तो केंद्रीय बैंकों के पास ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश कम रह सकती है, भले ही आर्थिक वृद्धि धीमी हो जाए।
ऐसा माहौल बॉन्ड और शेयर—दोनों के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है: बॉन्ड कीमतें गिरती हैं और शेयरों को कमजोर विकास और महंगे कर्ज़ का सामना करना पड़ता है।
आने वाले महीनों में बॉन्ड बाज़ार की दिशा दो मुख्य कारकों पर निर्भर करेगी:
अगर महंगाई की उम्मीदें ऊँची बनी रहती हैं, तो बॉन्ड यील्ड लंबे समय तक ऊँचे स्तर पर रह सकती हैं। इसका मतलब होगा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में वित्तीय स्थितियाँ और सख्त होंगी—और शेयर बाज़ारों, उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं तथा भारी कर्ज़ वाले देशों पर दबाव बना रह सकता है।
इस समय बॉन्ड बाज़ार एक साफ संकेत दे रहा है: सस्ते पैसे का दौर अभी भी गंभीर चुनौती के दौर से गुजर रहा है।
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