इस मुद्दे पर संभावित रूप से 7–8 जुलाई को तुर्किये की राजधानी अंकारा में होने वाले NATO नेताओं के शिखर सम्मेलन में चर्चा हो सकती है।
NATO के यूरोप में सर्वोच्च सैन्य कमांडर (SACEUR) और अमेरिकी वायुसेना के जनरल एलेक्सस ग्रिंकिविच ने साफ किया है कि गठबंधन अभी ऑपरेशन शुरू करने से काफी दूर है।
उनका कहना है कि फिलहाल केवल इस पर विचार किया जा रहा है कि NATO किस तरह योगदान दे सकता है। जब तक राजनीतिक स्तर पर निर्णय नहीं होता, तब तक सैन्य योजना बनाना शुरू नहीं किया जाएगा।
उनके शब्दों में, पहले राजनीतिक दिशा तय होगी और उसके बाद ही सैन्य योजनाकार संभावित मिशन की रूपरेखा तैयार करेंगे।
अभी विस्तृत योजना सामने नहीं आई है, लेकिन अधिकारियों के अनुसार चर्चा कुछ संभावित उपायों पर केंद्रित है, जैसे:
ऐसा कोई भी मिशन संभवतः तेल टैंकरों और मालवाहक जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने पर केंद्रित होगा, न कि सीधे युद्ध अभियानों पर।
औपचारिक NATO मिशन न होने के बावजूद, कुछ यूरोपीय देशों ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ानी शुरू कर दी है।
रिपोर्टों के अनुसार:
यदि बाद में कोई संयुक्त मिशन बनता है तो यही तैनाती उसका आधार बन सकती है।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है।
कुछ प्रमुख तथ्य:
भौगोलिक रूप से यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है, इसलिए खाड़ी देशों के ऊर्जा निर्यात का मुख्य समुद्री रास्ता है।
यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो तेल की कीमतों, शिपिंग मार्गों और कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
हालांकि सैन्य विकल्प मौजूद हैं, लेकिन NATO के लिए किसी औपचारिक मिशन पर सहमत होना आसान नहीं होगा।
सबसे बड़ी बाधाएँ दो हैं।
1. सर्वसम्मति की आवश्यकता
NATO के किसी भी अभियान के लिए सभी 32 सदस्य देशों की मंजूरी जरूरी होती है, और कुछ देशों ने पहले ही आपत्तियाँ जताई हैं।
2. NATO की भूमिका को लेकर मतभेद
कुछ यूरोपीय सरकारों का मानना है कि यह संकट NATO के पारंपरिक भौगोलिक क्षेत्र से बाहर है और गठबंधन की भागीदारी उसे क्षेत्रीय संघर्ष में गहराई तक खींच सकती है।
इसी वजह से कुछ देशों का समर्थन पर्याप्त नहीं है—सभी सदस्य देशों की सहमति आवश्यक है।
फिलहाल NATO की संभावित भूमिका केवल चर्चा के स्तर पर है। कमांडर और सैन्य अधिकारी विकल्पों का आकलन कर रहे हैं, लेकिन योजना तभी शुरू होगी जब सदस्य देश राजनीतिक स्तर पर हरी झंडी देंगे।
इसलिए अंकारा में होने वाला जुलाई का NATO शिखर सम्मेलन इस मुद्दे पर अहम मोड़ साबित हो सकता है। यदि तब तक शिपिंग संकट जारी रहता है और सदस्य देश सहमत हो जाते हैं, तो गठबंधन चर्चा से आगे बढ़कर वास्तविक मिशन की योजना बना सकता है।
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