यह तरीका खास तौर पर ड्रोन जैसे हथियारों के लिए तेज़ साबित होता है, क्योंकि उनका निर्माण कई अलग‑अलग स्थानों पर छोटे‑छोटे घटकों से किया जा सकता है और उनकी लागत उन्नत मिसाइल प्रणालियों की तुलना में कम होती है।
पुनर्निर्माण की रफ्तार तेज़ होने का एक बड़ा कारण यह भी है कि ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थी।
रिपोर्टों में उद्धृत अमेरिकी खुफिया अनुमान बताते हैं कि ईरान के पास अभी भी अपने युद्ध‑पूर्व ड्रोन बेड़े का लगभग 40% और 60% से अधिक मिसाइल लॉन्चर मौजूद हैं।
कई लॉन्चर सिस्टम कथित तौर पर गुफाओं, बंकरों या भूमिगत ठिकानों में छिपाकर रखे गए थे और लड़ाई रुकने के बाद उन्हें फिर से बाहर निकाला गया।
क्योंकि ये सिस्टम और उन्हें चलाने वाले प्रशिक्षित कर्मी सुरक्षित रहे, इसलिए ईरान को पूरी तरह से शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ी।
पुनर्निर्माण को तेज़ करने में बाहरी सहयोग और आपूर्ति भी एक कारक माना जा रहा है।
कुछ खुफिया रिपोर्टों और विश्लेषणों के अनुसार रूस ने युद्धविराम के दौरान कैस्पियन सागर के रास्ते ड्रोन के घटक भेजकर ईरान की ड्रोन क्षमता बहाल करने में मदद की है।
इसी बीच वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर हुई जांच में संकेत मिले हैं कि चीन की कुछ कंपनियाँ इंजन, माइक्रोचिप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक घटक निर्यात करती रही हैं जो "शाहेद" प्रकार के ड्रोन में उपयोग किए जाते हैं, भले ही उन पर प्रतिबंध लगे हों।
ये सामान अक्सर पूर्ण हथियारों के बजाय दोहरे उपयोग (dual‑use) वाले इलेक्ट्रॉनिक या विमानन हिस्सों के रूप में भेजे जाते हैं, जिससे उन्हें रोकना कठिन हो जाता है और ईरान उन्हें देश के भीतर असेंबल कर सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार ईरान की तेज़ रिकवरी के पीछे कई कारण हैं:
इन सभी कारकों के कारण ईरान मरम्मत, पुनःपूर्ति और उत्पादन—तीनों प्रक्रियाएँ एक साथ चला पा रहा है।
कुछ अमेरिकी खुफिया आकलनों का कहना है कि यदि यही गति बनी रहती है तो ईरान लगभग छह महीनों के भीतर अपनी ड्रोन हमलावर क्षमता पूरी तरह पुनर्स्थापित कर सकता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर क्षतिग्रस्त फैक्टरी तुरंत पूरी तरह बहाल हो जाएगी, बल्कि यह कि संचालन के लिए पर्याप्त ड्रोन, लॉन्चर और उत्पादन क्षमता फिर से उपलब्ध हो सकती है।
यदि ऐसा होता है, तो मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति पर इसका असर पड़ सकता है—खासतौर पर तब जब तेहरान बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले करने या क्षेत्रीय सहयोगी समूहों को हथियार देने की क्षमता फिर हासिल कर ले।
अगर ईरान कुछ महीनों में अपनी ड्रोन और मिसाइल क्षमता का बड़ा हिस्सा वापस पा लेता है, तो पहले किए गए सैन्य हमलों का दीर्घकालिक असर सीमित हो सकता है।
ऐसी स्थिति में तेहरान भविष्य की वार्ताओं में अधिक मजबूत स्थिति में आ सकता है और समझौते के लिए दबाव कम महसूस कर सकता है। साथ ही, ड्रोन या मिसाइल हमलों की संभावित वापसी से इज़राइल, खाड़ी देशों और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी बलों के साथ तनाव फिर बढ़ सकता है।
विश्लेषक यह भी चेतावनी देते हैं कि पुनर्निर्माण से जुड़ी कई जानकारियाँ खुफिया स्रोतों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं। इसलिए सटीक समयसीमा, उत्पादन स्तर और विदेशी सहायता की वास्तविक मात्रा अभी अनुमान ही मानी जाती है।
फिर भी इतना स्पष्ट है कि युद्धविराम ने ईरान को अपने सैन्य‑औद्योगिक ढांचे को व्यवस्थित करने, मरम्मत करने और दोबारा शुरू करने का महत्वपूर्ण अवसर दिया है—और यह दिखाता है कि बिखरे हुए ड्रोन और मिसाइल कार्यक्रम लंबे हवाई हमलों के बाद भी अपेक्षा से अधिक लचीले हो सकते हैं।
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