यूरोप में 2026 के दौरान पंप पर ईंधन महंगा होने की वजह सिर्फ कच्चे तेल का दाम नहीं है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास जहाज़ों की आवाजाही में बाधा ने तैयार ईंधन की खेपों को प्रभावित किया है। उधर, खाड़ी क्षेत्र और रूस की रिफाइनरियों में नुकसान से उत्पादन पर भी असर पड़ा है। जब डीजल जैसे तैयार ईंधन की आपूर्ति घटती है, तो चलती हुई रिफाइनरियों के लिए कच्चे तेल को ईंधन में बदलने का मूल्य बढ़ सकता है।
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किल्लत से रिफाइनरी की कमाई कैसे बढ़ती है?
रॉयटर्स की रिपोर्ट में उद्धृत आँकड़ों के मुताबिक, मार्च से अगस्त के बीच मध्य पूर्व से डीजल निर्यात आधा होकर लगभग 8 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यूरोप के एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र में 10 सितंबर को डीजल का भंडार साल के इस समय के लिहाज़ से सबसे निचले स्तर पर था। यूक्रेनी हमलों ने रूसी रिफाइनरियों का उत्पादन भी घटाया और रूस ने जुलाई में डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। यानी संकट केवल कच्चे तेल की उपलब्धता का नहीं, उससे बनने वाले तैयार ईंधन की आपूर्ति का भी है।
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इस अंतर को समझने के लिए क्रैक स्प्रेड अहम है: यह तैयार ईंधन की कीमत और उसे बनाने में इस्तेमाल कच्चे तेल की कीमत के बीच का फर्क है। ईंधन की किल्लत बढ़ने पर यह फर्क बढ़ सकता है, भले ही कच्चा तेल खुद महंगा हो। लेकिन इसे रिफाइनरी का शुद्ध मुनाफा नहीं समझना चाहिए—संचालन और दूसरे खर्च अभी बाकी होते हैं। स्पेन की ऊर्जा कंपनी रेपसोल ने बताया कि बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन और तेल की कीमतों के बीच उसका दूसरी तिमाही का मुनाफा तीन गुना हुआ।
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किल्लत का आकार बताते समय भी माप का फर्क ज़रूरी है। उपलब्ध रिपोर्टिंग से यह स्थापित नहीं होता कि दुनिया की कम-से-कम 10% रिफाइनिंग क्षमता बंद है या रूस की लगभग 40% क्षमता निष्क्रिय हो गई है। रॉयटर्स ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आकलन के आधार पर बताया कि जून में रूसी रिफाइनरियों में कच्चे तेल का प्रसंस्करण एक साल पहले से 30% कम था। प्रभावित क्षमता, वास्तव में प्रसंस्कृत तेल और निर्यात के लिए उपलब्ध ईंधन—तीनों अलग आँकड़े हैं।
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शेयर चढ़े, पर हर बढ़त रिफाइनिंग से नहीं आई
ईंधन बाजार में तंगी के साथ यूरोपीय ऊर्जा शेयरों में भी तेजी आई। प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार, 23 सितंबर तक रेपसोल के शेयर 87.2% और टोटलएनर्जीज़ के 40.6% चढ़े थे। टोटलएनर्जीज़ का यूरोपीय रिफाइनिंग-मार्जिन संकेतक 4.7 डॉलर से बढ़कर 13.5 डॉलर प्रति बैरल हुआ। ये आँकड़े रिफाइनिंग कारोबार की बेहतर स्थिति दिखाते हैं, लेकिन शेयरों की पूरी बढ़त उसी के खाते में नहीं डाली जा सकती: इन कंपनियों के दूसरे कारोबार भी हैं, और शेयर का रिटर्न मुनाफे का आँकड़ा नहीं होता।
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मार्जिन के अलग-अलग आँकड़े भी एक जैसे नहीं हैं। यूरोन्यूज़ के मुताबिक एक अनुमान में डीजल मार्जिन पंप की कीमत का करीब 41 यूरो सेंट प्रति लीटर, यानी लगभग पाँचवाँ हिस्सा है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर लीटर पर कंपनी को 41 सेंट का शुद्ध लाभ मिलता है। यह आँकड़ा टोटलएनर्जीज़ के अपने रिफाइनिंग-मार्जिन संकेतक से भी अलग है।
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ग्राहकों और अर्थव्यवस्था पर असर
महंगे ईंधन का दबाव वाहन चालकों से आगे जाता है। केबीसी के सितंबर विश्लेषण के अनुसार, यूरो क्षेत्र में ऊर्जा कीमतों की सालाना वृद्धि दर जुलाई के 10.3% से अगस्त में 14.3% हो गई। यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) ने 10 सितंबर को अपनी तीन प्रमुख ब्याज दरें 0.25 प्रतिशत अंक बढ़ाईं और मध्य पूर्व के संघर्ष से पैदा महंगाई के दबाव का स्पष्ट उल्लेख किया। बैंक के कर्मचारियों ने अनुमान लगाया कि कुल महंगाई दर चौथी तिमाही में 3.6% पर पहुँच सकती है; ऊर्जा कीमतों का झटका कब कम होगा, इस पर अनिश्चितता बनी हुई है।
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निर्यात रोकना भी क्षतिग्रस्त रिफाइनरियों की मरम्मत या बाधित समुद्री आवाजाही का विकल्प नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के विचार का समर्थन किया, लेकिन अधिकारी तब भी इसकी व्यवहार्यता पर विचार कर रहे थे। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री ने चेताया कि इससे देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर कीमतें बढ़ सकती हैं। रॉयटर्स से बात करने वाले विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा प्रतिबंध अमेरिकी कीमतों को शायद ही अधिक राहत दे, जबकि दूसरे देशों में किल्लत बढ़ा सकता है।
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दूसरे रास्तों पर भी दबाव है। अंतरराष्ट्रीय सड़क परिवहन संघ के अनुसार, हॉर्मुज़ से जहाज़ों की आवाजाही बहुत सीमित थी और सऊदी अरब की ईस्ट–वेस्ट तेल पाइपलाइन बंद थी; संघर्ष शुरू होने के बाद से उससे अनुमानतः 40–50 लाख बैरल प्रतिदिन तेल गुजर रहा था। बाब अल-मंदेब के पास जहाज़ों को खतरे से लाल सागर का रास्ता भी अधिक जटिल हुआ है। यह पाइपलाइन तेल का मार्ग है, तरलीकृत प्राकृतिक गैस का वैकल्पिक रास्ता नहीं; इन बाधाओं का मतलब यह भी नहीं कि माल भेजने का हर दूसरा विकल्प खत्म हो गया है।
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आगे का सवाल है कि तैयार ईंधन की कमी कितने समय तक रहती है। बाधाएँ बनी रहीं तो चालू रिफाइनरियों के मार्जिन को सहारा मिल सकता है; आपूर्ति लौटने या माँग घटने पर वे सिमट सकते हैं। ईसीबी का महंगाई अनुमान भी ऊर्जा झटके के कम होने की धारणा पर टिका है, जिसके समय को लेकर बैंक ने अनिश्चितता जताई है।
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