उदाहरण के लिए, अमेरिकी कंपनी हर्शे (Hershey) ने कहा है कि वह अपने कुछ उत्पादों में कोकोआ की मात्रा बढ़ाएगी और उन्हें फिर से क्लासिक मिल्क और डार्क चॉकलेट रेसिपी की ओर ले जाएगी। कंपनी के अनुसार कमी के समय केवल कुछ सीमित उत्पादों में कम‑चॉकलेट कोटिंग का इस्तेमाल किया गया था।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि कच्चे माल की लागत स्थिर रहती है तो अन्य कंपनियां भी इसी दिशा में कदम उठा सकती हैं। इससे भविष्य में उपभोक्ताओं के लिए चॉकलेट की कीमतों पर भी कुछ राहत मिल सकती है।
कीमतों में गिरावट के पीछे कई बाजार कारक काम कर रहे हैं।
दुनिया का ज्यादातर कोकोआ पश्चिम अफ्रीका में उगाया जाता है। सबसे बड़ा उत्पादक आइवरी कोस्ट है।
देश ने 2025–26 सीजन के लिए उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर लगभग 2.2 मिलियन मीट्रिक टन कर दिया है। यह बेहतर मौसम और मजबूत फसल विकास का परिणाम माना जा रहा है। इस अनुमान ने वैश्विक फ्यूचर्स कीमतों को नीचे धकेला।
इसके अलावा क्षेत्र में लगातार बारिश और बेहतर खेती की परिस्थितियों से कोकोआ के पेड़ों पर फल (pods) की वृद्धि भी बढ़ी।
2024 के संकट के दौरान बाजार में कोकोआ की भारी कमी थी। लेकिन जैसे‑जैसे उत्पादन के अनुमान बेहतर हुए, वैश्विक स्टॉक फिर से बनने लगे।
जब कोकोआ बहुत महंगा हो गया था, तब कंपनियों को खुदरा कीमतें बढ़ानी पड़ीं या उत्पादों में बदलाव करना पड़ा। इससे चॉकलेट की मांग कुछ हद तक कमजोर हो गई।
कमजोर मांग और बेहतर आपूर्ति—यह संयोजन अक्सर कमोडिटी बाजार में तेज गिरावट का कारण बनता है।
सैद्धांतिक रूप से देखें तो सस्ती कोकोआ बीन्स चॉकलेट कंपनियों के लिए अच्छी खबर होनी चाहिए। लेकिन वास्तविकता थोड़ी जटिल है।
स्विस कंपनी बैरी कैलेबाउट (Barry Callebaut)—जो दुनिया की सबसे बड़ी कोकोआ प्रोसेसर है और नेस्ले तथा यूनिलीवर जैसे ब्रांडों को सप्लाई करती है—ने चेतावनी दी है कि उद्योग की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है।
कंपनी ने अपने ऑपरेटिंग प्रॉफिट का अनुमान घटाया और कहा कि सप्लाई‑चेन समस्याएं तथा बाजार में अतिरिक्त क्षमता (overcapacity) दबाव बना रही हैं। इस खबर के बाद कंपनी के शेयर भी गिर गए।
तेजी से बदलती कीमतें हेजिंग रणनीतियों को भी प्रभावित करती हैं और लंबी अवधि के सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स को जटिल बना देती हैं। कुछ कंपनियों ने यह भी बताया है कि बीन्स सस्ती होने के बावजूद चॉकलेट की बिक्री मात्रा अभी पूरी तरह नहीं सुधरी है।
इस गिरावट का सबसे तत्काल प्रभाव उन किसानों पर पड़ा है जो दुनिया का अधिकांश कोकोआ उगाते हैं—खासकर आइवरी कोस्ट और घाना, जो मिलकर वैश्विक आपूर्ति का आधे से अधिक हिस्सा देते हैं।
कई क्षेत्रों में किसानों की फसल बिक नहीं पा रही है। कुछ जगहों पर गोदामों में कोकोआ की बोरियां जमा होती जा रही हैं, क्योंकि निर्यातक पहले तय कीमतों पर खरीदने से हिचक रहे हैं।
इसके अलावा कुछ किसानों को महीनों तक भुगतान नहीं मिला, जिससे उनके परिवारों की नकदी स्थिति गंभीर हो गई।
स्थिति इतनी खराब हुई कि आइवरी कोस्ट की सरकार को 2026 के मध्य‑सीजन में किसानों को मिलने वाली आधिकारिक कीमत आधे से भी ज्यादा घटानी पड़ी।
यह समस्या कमोडिटी खेती की एक पुरानी वास्तविकता दिखाती है—कीमत बढ़ने पर किसान अक्सर पूरा लाभ नहीं ले पाते, लेकिन गिरावट का असर तुरंत झेलना पड़ता है।
कोकोआ बाजार का यह तेज उतार‑चढ़ाव दिखाता है कि वैश्विक चॉकलेट सप्लाई चेन कितनी संवेदनशील है।
विश्लेषकों के अनुसार, आगे भी कोकोआ बाजार में उतार‑चढ़ाव बना रह सकता है। जलवायु जोखिम, फसल रोग और पश्चिम अफ्रीका में उत्पादन की उच्च निर्भरता जैसे कारक इस बाजार को लंबे समय तक अस्थिर रख सकते हैं।
चॉकलेट प्रेमियों के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि आने वाले समय में उत्पादों में फिर से ज्यादा कोकोआ दिखाई दे। लेकिन जिन किसानों के खेतों में यह फसल उगती है, उनके लिए यह कीमतों का झूला अभी भी बहुत कठिन है।
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