हाल के इंटरव्यू और चर्चाओं में श्मिट ने एक अलग लेकिन संबंधित बिंदु पर जोर दिया है। उनके अनुसार:
यानी समस्या सिर्फ बिजली की कमी नहीं है। असली चुनौती यह है कि उस बिजली और कंप्यूटिंग क्षमता को बनाने के लिए जो विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, उसे फंड कौन करेगा।
AI के लिए जरूरी है:
इसलिए AI को स्केल करना अब एक साधारण सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट जैसा नहीं रहा—यह राष्ट्रीय स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण जैसा बनता जा रहा है।
श्मिट ने AI डेटा‑सेंटर क्षमता की लागत को समझाने के लिए एक मोटा अनुमान दिया है।
इस हिसाब से:
यह सिर्फ बिजली संयंत्रों की लागत नहीं है। इसमें डेटा सेंटर, चिप्स, नेटवर्क, कूलिंग, निर्माण और ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर सब शामिल हैं।
यदि AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ट्रिलियन‑डॉलर निवेश की जरूरत होगी, तो श्मिट के अनुसार दुनिया में बहुत कम जगहें हैं जो इतना बड़ा निवेश जुटा सकती हैं।
उनकी नजर में दो प्रमुख खिलाड़ी हैं:
संयुक्त राज्य अमेरिका
अमेरिका के पास कई फायदे हैं:
यह पूरा इकोसिस्टम बड़े पैमाने पर निजी निवेश को आकर्षित कर सकता है, और जरूरत पड़ने पर सरकारी सहयोग भी मिल सकता है।
चीन
चीन का मॉडल अलग है लेकिन उतना ही शक्तिशाली हो सकता है। वहां राज्य‑समर्थित औद्योगिक नीति बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए वित्त, निर्माण और तकनीकी तैनाती को समन्वित कर सकती है।
इससे चीन राष्ट्रीय स्तर पर बड़े AI इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ा सकता है।
श्मिट ने चेतावनी दी है कि यूरोप इस दौड़ में पीछे रह सकता है।
उनके अनुसार महाद्वीप में अभी स्पष्ट AI रणनीति की कमी है, और यदि यूरोप अपने स्वयं के AI मॉडल और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश नहीं करता, तो उसे विदेशी तकनीक पर निर्भर होना पड़ सकता है।
उन्होंने यहां तक कहा कि अगर यूरोप पर्याप्त निवेश नहीं करता, तो अंततः उसे चीनी AI मॉडल का उपयोग करना पड़ सकता है।
इसके पीछे कुछ संरचनात्मक कारण भी हैं:
इन कारणों से विशाल AI परियोजनाओं के लिए तेजी से पूंजी जुटाना मुश्किल हो सकता है।
पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि श्मिट ने अपना तर्क बदल दिया है। लेकिन वास्तव में दोनों विचार एक ही समस्या के दो पहलू हैं।
यानी अगर कोई देश या कंपनी पर्याप्त पैसा निवेश कर सकती है, तो वह नए बिजली संयंत्र, डेटा सेंटर और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर बनाकर ऊर्जा की समस्या को भी हल कर सकती है।
यदि ये अनुमान सही साबित होते हैं, तो AI की वैश्विक प्रतिस्पर्धा पिछली सदी की बड़ी तकनीकी दौड़ों जैसी दिख सकती है—जैसे रेल नेटवर्क, टेलीकॉम या अंतरिक्ष कार्यक्रम।
अब सफलता केवल बेहतर एल्गोरिदम बनाने से तय नहीं होगी। यह इस पर भी निर्भर करेगी कि कौन तेजी से संगठित कर सकता है:
इस दृष्टिकोण में, AI का भविष्य सिर्फ तकनीकी नवाचार से नहीं बल्कि औद्योगिक स्तर के निर्माण और वित्तीय शक्ति से तय हो सकता है।
Comments
0 comments