किएल इंस्टीट्यूट के शोध के अनुसार यदि यह मार्ग पूरी तरह बंद हो जाए तो दुनिया के लगभग एक‑पाँचवें तेल और लगभग एक‑चौथाई LNG व्यापार पर असर पड़ सकता है। ऊर्जा आपूर्ति में ऐसे झटके रासायनिक उद्योग, उर्वरक उत्पादन और कृषि लागत तक पहुँच जाते हैं, जिससे अंततः खाद्य कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
ETC का कहना है कि होर्मुज़ संकट ने ऊर्जा प्रणाली की एक संरचनात्मक कमजोरी उजागर की—दुनिया का भारी निर्भर होना उन जीवाश्म ईंधनों पर जिन्हें कुछ सीमित भौगोलिक मार्गों से होकर गुजरना पड़ता है।
आयोग के अनुसार तीन प्रमुख परिवर्तन मिलकर तेल मांग को बड़े पैमाने पर घटा सकते हैं:
• परिवहन और उद्योग का विद्युतीकरण, जिससे तेल की जगह बिजली का उपयोग बढ़ेगा।
• ऊर्जा दक्षता में सुधार, जिससे कुल ऊर्जा मांग कम होगी।
• नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, जैसे सौर और पवन ऊर्जा।
इन तीनों बदलावों का संयुक्त प्रभाव इतना बड़ा हो सकता है कि 2035 तक तेल की वैश्विक मांग में उतनी कमी आ जाए जितना तेल अभी होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है।
हालाँकि उपलब्ध स्रोतों में यह स्पष्ट नहीं है कि इस अनुमान के पीछे कौन‑सी सटीक धारणाएँ हैं—जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों की गति या नवीकरणीय ऊर्जा की तैनाती की दर—इसलिए उस विस्तृत मॉडल की स्वतंत्र पुष्टि यहाँ संभव नहीं है।
होर्मुज़ संकट के बाद ऊर्जा नीति विशेषज्ञों के बीच एक तर्क मजबूत हुआ है: नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ जीवाश्म ईंधन आपूर्ति श्रृंखला से अलग तरीके से काम करती हैं।
तेल और गैस को निकालना, जहाज़ों या पाइपलाइनों से ले जाना और वैश्विक बाज़ारों में व्यापार करना पड़ता है। इससे होर्मुज़ जैसे रणनीतिक मार्गों पर निर्भरता बनती है, जहाँ राजनीतिक तनाव आपूर्ति को बाधित कर सकता है।
इसके विपरीत, सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोत स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होते हैं। एक बार बिजली संयंत्र और ग्रिड बन जाने के बाद ऊर्जा उत्पादन के लिए अंतरराष्ट्रीय ईंधन आपूर्ति पर निर्भरता नहीं रहती।
यही कारण है कि कई विश्लेषक कहते हैं कि स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियाँ भू‑राजनीतिक झटकों से संरचनात्मक रूप से कम प्रभावित होती हैं।
यूरोपीय आयोग भी मानता है कि नवीकरणीय ऊर्जा घरेलू उत्पादन बढ़ाकर और आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाकर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करती है।
इस संकट ने दिखाया कि ऊर्जा आपूर्ति में बाधा कितनी तेजी से पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
तेल की कीमतों में वृद्धि केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहती। महंगे ईंधन से परिवहन और उर्वरक की लागत बढ़ती है, और यह असर खाद्य कीमतों तथा औद्योगिक उत्पादन तक पहुँच जाता है।
ऊर्जा आयात पर निर्भर विकासशील देशों के लिए यह जोखिम और बड़ा होता है क्योंकि उनके पास अक्सर सीमित रणनीतिक भंडार और कम आपूर्ति विकल्प होते हैं।
इसी वजह से कई नीति विश्लेषक मानते हैं कि बार‑बार होने वाले भू‑राजनीतिक झटके देशों को ऊर्जा दक्षता, विद्युतीकरण और घरेलू स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों की ओर तेजी से धकेल सकते हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि संकट के समय अक्सर सरकारें जल्दबाज़ी में नए तेल या गैस ढाँचे में निवेश कर देती हैं, जिससे लंबे समय तक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता बनी रहती है।
इसके बजाय नीति समूह कुछ प्रमुख कदम सुझाते हैं:
• नवीकरणीय और कम‑कार्बन ऊर्जा प्रणालियों की तेज़ तैनाती
• परिवहन, हीटिंग और उद्योग में विद्युतीकरण बढ़ाना
• ऊर्जा दक्षता उपायों को व्यापक बनाना
• अल्पकाल में बाज़ार स्थिर करना लेकिन दीर्घकाल में आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाना
होर्मुज़ संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि दुनिया की ऊर्जा प्रणाली अभी भी कुछ सीमित मार्गों पर केंद्रित है। जब एक ही जलमार्ग से गुजरने वाले लगभग 20% तेल प्रवाह में बाधा आती है, तो उसका आर्थिक असर पूरी दुनिया में महसूस होता है।
ऊर्जा ट्रांज़िशन आयोग का तर्क है कि दीर्घकालिक समाधान केवल समुद्री मार्गों की सुरक्षा या अधिक तेल उत्पादन नहीं है, बल्कि ऐसे ईंधनों पर निर्भरता ही कम करना है जिन्हें इन संकरे मार्गों से होकर गुजरना पड़ता है।
क्या 2035 तक स्वच्छ ऊर्जा वास्तव में होर्मुज़ के बराबर तेल मांग को खत्म कर सकती है—यह अभी निश्चित नहीं है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि विद्युतीकरण, ऊर्जा दक्षता और घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं।
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