3. “पीक और गिरावट” वाले रास्तों पर ध्यान
कई सीनारियो ऐसे बनाए गए हैं जिनमें उत्सर्जन पहले बढ़ता है, फिर मध्य या बाद की सदी में घटता है। इससे वैज्ञानिक यह अध्ययन कर सकते हैं कि यदि तापमान किसी लक्ष्य से ऊपर चला जाए तो बाद में उसे कितना वापस लाया जा सकता है।
पिछले दशक में जलवायु विज्ञान और मीडिया में सबसे अधिक चर्चा जिस सीनारियो की होती थी, वह था SSP5‑8.5। यह एक ऐसा भविष्य मानकर चलता था जिसमें दुनिया में जीवाश्म ईंधन का उपयोग तेज़ी से बढ़ता रहता है और 2100 तक बहुत अधिक रेडिएटिव फोर्सिंग (8.5 W/m²) हो जाती है।
लेकिन CMIP7 डिजाइन प्रक्रिया के दौरान वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह स्तर अब “असंभावित” माना जा सकता है।
इसके पीछे कई कारण हैं:
इसलिए नए फ्रेमवर्क में उच्च उत्सर्जन वाला सीनारियो अब भी मौजूद है, लेकिन उसका अनुमानित प्रभाव SSP5‑8.5 से कम माना जाता है।
पेरिस समझौते का लक्ष्य है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को प्री‑इंडस्ट्रियल स्तर से 1.5°C के भीतर रखा जाए। लेकिन कई हालिया विश्लेषण बताते हैं कि वास्तविक नीतियों और उत्सर्जन रुझानों को देखते हुए यह लक्ष्य बिना अस्थायी रूप से सीमा पार किए हासिल करना कठिन हो गया है।
इसलिए CMIP7 सीनारियो में “ओवरशूट” मार्ग शामिल किए गए हैं। इनमें तापमान पहले 1.5°C से ऊपर जा सकता है और बाद में गहरे उत्सर्जन कटौती तथा कार्बन डाइऑक्साइड हटाने (CDR) तकनीकों के जरिए कम किया जा सकता है।
IPCC के विश्लेषण के अनुसार, यदि केवल मौजूदा नीतियों को जारी रखा जाए तो इस सदी के अंत तक औसत तापमान वृद्धि लगभग 2.2°C से 3.5°C तक पहुँच सकती है।
स्वतंत्र शोध समूह Climate Action Tracker के विश्लेषण के अनुसार, दुनिया की वर्तमान नीतियाँ लगभग 2.6°C से 2.8°C तक वैश्विक तापमान वृद्धि की ओर इशारा करती हैं।
इसका अर्थ है कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों और वर्तमान नीति‑पथ के बीच अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है।
हालाँकि भविष्य पूरी तरह तय नहीं है। ऊर्जा प्रणाली में तेज़ बदलाव तापमान वृद्धि को काफी कम कर सकते हैं।
Climate Action Tracker के अनुसार तीन बड़े कदम इस सदी के अनुमानित तापमान को लगभग 0.9°C तक कम कर सकते हैं:
CMIP7 का नया ढांचा यह नहीं कहता कि जलवायु संकट खत्म हो गया है। बल्कि इसका मतलब यह है कि वैज्ञानिक अब अत्यधिक काल्पनिक सीनारियो के बजाय अधिक यथार्थवादी और नीति‑संबंधी भविष्य का अध्ययन करना चाहते हैं।
आज की स्थिति को संक्षेप में समझें तो:
अगले दशक में नीति और तकनीक की दिशा तय करेगी कि दुनिया इस सदी के अंत तक किस तापमान स्तर तक पहुँचती है।
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