दक्षिणी सऊदी अरब पर हूती ड्रोन और मिसाइल हमलों ने 7 अगस्त को हस्ताक्षरित मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की पहली गंभीर व्यावहारिक परीक्षा खड़ी कर दी है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के इस समझौते का केंद्रीय वादा है कि किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। मगर सार्वजनिक रूप से जारी जानकारी यह नहीं बताती कि प्रत्येक देश को किस तरह की सैन्य मदद देनी होगी या कोई प्रतिक्रिया स्वतः शुरू होगी।
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सऊदी अधिकारियों ने कहा कि अबहा, खमीस मुशैत, जाज़ान और नज़रान में नागरिक तथा आर्थिक ठिकाने निशाना बने। हमलों में 73 नागरिक घायल हुए, ऊर्जा प्रतिष्ठानों में आग लगी और कुछ परिचालन अस्थायी रूप से रोकने पड़े।
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14 हूतियों ने अबहा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे, किंग खालिद एयर बेस तथा अबहा और जाज़ान में अरामको से जुड़े प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने का दावा किया है; इन विशिष्ट लक्ष्यों को हूती पक्ष के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
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यह समझौते की परीक्षा क्यों है
हमले सऊदी क्षेत्र पर हुए हैं—यानी ठीक वह स्थिति जिसके लिए समझौते की सामूहिक रक्षा वाली भाषा बनाई गई थी। सऊदी अधिकारियों ने इन्हें “खतरनाक उकसाव” बताया, जबकि विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान ने कहा कि राज्य अपनी रक्षा करने में हिचकेगा नहीं।
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मुख्य सवाल यह नहीं है कि समझौता इस मामले में लागू होता है या नहीं। असली कसौटी यह है कि क्या रियाद पाकिस्तान और तुर्किये से तेज़ तथा उपयोगी सहयोग जुटा पाता है, और क्या यह सहयोग प्रतिक्रिया को यमन में व्यापक युद्ध में बदले बिना दिया जा सकता है।
उपलब्ध रिपोर्टिंग में समझौते को औपचारिक रूप से सक्रिय करने या तीनों देशों की संयुक्त लामबंदी की कोई घोषणा नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि समझौता अप्रासंगिक हो गया; बल्कि तत्काल प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से घोषित संयुक्त सैन्य अभियान के स्तर से नीचे भी रह सकती है।
समझौता वास्तव में क्या कहता है
संयुक्त वक्तव्य के अनुसार, तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा और इसका उद्देश्य किसी भी आक्रामक कार्रवाई के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना है।
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40 तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने इसके सिद्धांत को तकनीकी रूप से नाटो के अनुच्छेद 5 जैसा बताया था।
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तुलना उपयोगी है, लेकिन पूरी तरह समान नहीं है।
नाटो का अनुच्छेद 5 भी सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता है, न कि ऐसा पूर्व-लिखित आदेश जिसमें हर सहयोगी को एक जैसी कार्रवाई करनी ही पड़े। मक्का समझौता भी हमले की स्थिति में साझा राजनीतिक जिम्मेदारी का संकेत देता है। लेकिन रॉयटर्स के अनुसार, समझौते के वक्तव्य में ठोस प्रतिबद्धताओं या रक्षा दायित्वों का विवरण नहीं दिया गया था।
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इसलिए सार्वजनिक रिकॉर्ड से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सैनिक भेजना, संयुक्त हवाई हमला करना या सऊदी सीमा के बाहर अभियान चलाना अनिवार्य अथवा स्वचालित होगा। घोषित शर्तों के आधार पर इसे एक मजबूत प्रतिरोधक वचन के रूप में देखना अधिक उचित है, जिसका अमल आपसी परामर्श और हर देश के अपने निर्णय पर निर्भर करेगा।
नया गठबंधन, जिसकी कार्यप्रणाली अभी बन रही है
समय-क्रम यहां महत्वपूर्ण है। अगस्त की शुरुआत में समझौते पर हस्ताक्षर के बाद तीनों देशों ने वरिष्ठ मंत्रियों को एक ढांचे में लाने, संयुक्त अभ्यास करने और रक्षा-उद्योग सहयोग बढ़ाने की योजना बताई थी।
17 उसी महीने उनकी पहली समिति बैठक भी हुई, जो दिखाती है कि साझेदार राजनीतिक और सैन्य समन्वय की व्यवस्थाएं अभी बना रहे थे।
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ये कदम आगे चलकर साझा योजना और सैन्य तालमेल बेहतर कर सकते हैं। लेकिन इनसे यह भी स्पष्ट होता है कि इस गठबंधन को अपनी पहली आपात स्थिति में नाटो जैसी पुरानी, एकीकृत सैन्य कमान मान लेना उचित नहीं होगा। सार्वजनिक रिपोर्टों में कोई घोषित ट्रिगर-प्रणाली, स्थायी बहुराष्ट्रीय बल या जिम्मेदारियों का विस्तृत बंटवारा नहीं है।
सहयोगी मदद का सीमित लेकिन असरदार रूप क्या हो सकता है
समझौते की व्यापक भाषा ऐसी सहायता की गुंजाइश छोड़ती है जो अर्थपूर्ण हो, मगर संघर्ष को स्वतः न बढ़ाए। मिसाइल, ड्रोन और महत्वपूर्ण ढांचे पर खतरे वाली स्थिति में सबसे संभावित सहयोग रक्षात्मक समन्वय का हो सकता है—जैसे वायु एवं मिसाइल रक्षा में सहयोग, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, प्रशिक्षण, रसद, उपकरण सहायता और कूटनीतिक समन्वय।
ऐसे कदम समझौते के घोषित प्रतिरोधक उद्देश्य तथा तीनों सरकारों की रक्षा-समन्वय योजनाओं के अनुरूप होंगे।
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19 साथ ही, वे पाकिस्तान या तुर्किये को यमन में अनिश्चितकालीन आक्रामक अभियान में शामिल किए बिना एकजुटता प्रदर्शित कर सकते हैं।
समीक्षित रिपोर्टिंग में सऊदी अरब में पाकिस्तान की किसी मौजूदा तैनाती के सटीक आकार या स्वरूप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिलती। इसलिए ऐसे आंकड़ों को इस बात के प्रमाण के रूप में नहीं लेना चाहिए कि पाकिस्तान आक्रामक कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है।
यमन और बाब अल-मंदब का जोखिम
ये हमले यमन में फिर से तेज हुई लड़ाई के बीच हुए हैं। रिपोर्टों में बाब अल-मंदब क्षेत्र की ओर हूती बढ़त और उसके बाद मारिब में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के कथित हमलों का भी उल्लेख है।
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10 बाब अल-मंदब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह पृष्ठभूमि जोखिम बढ़ाती है: सऊदी क्षेत्र की सुरक्षा पर केंद्रित जवाब को राजनीतिक रूप से यमन में व्यापक हस्तक्षेप से अलग रखा जा सकता है, लेकिन सक्रिय संघर्ष के बीच तनाव बढ़ने की आशंका स्पष्ट है।
रियाद के लिए रणनीतिक लक्ष्य नागरिकों और ऊर्जा ढांचे की रक्षा करते हुए प्रतिरोधक क्षमता बहाल करना होगा। इस्लामाबाद और अंकारा के लिए चुनौती यह है कि वे समय पर और दिखने योग्य रक्षात्मक सहयोग से नए समझौते को विश्वसनीय बनाएं, लेकिन अपनी भागीदारी के पैमाने और दायरे पर नियंत्रण भी रखें।
निष्कर्ष
इन हमलों ने मक्का समझौते की कानूनी भाषा से अधिक उसकी विश्वसनीयता को परखा है। “एक पर हमला, सभी पर हमला” वाला प्रावधान सऊदी अरब को सहयोगी समर्थन मांगने का मजबूत आधार देता है, और हमलों के मानवीय तथा आर्थिक परिणाम चुनौती को तत्काल बनाते हैं।
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लेकिन सार्वजनिक समझौता किसी स्वचालित त्रिपक्षीय युद्ध-योजना का प्रावधान नहीं करता। जब तक नई समन्वय व्यवस्थाएं विकसित नहीं हो जातीं और सदस्य संकट के समय कार्रवाई का तरीका अधिक स्पष्ट नहीं करते, इस समझौते की सबसे अहम परीक्षा यह होगी कि क्या यह तेज़ रक्षात्मक सहायता दिलाता है—न कि यह कि क्या इससे औपचारिक सामूहिक सैन्य अभियान शुरू होता है।
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