उद्योग क्षेत्र में भी मजबूत सुधार के संकेत नहीं मिले।
Eurostat के अनुसार मार्च 2026 में यूरोज़ोन का औद्योगिक उत्पादन महीने‑दर‑महीने 0.2% बढ़ा, जबकि पूरे यूरोपीय संघ (EU) में यह वृद्धि 0.8% रही।
हालांकि अभी पूरे तिमाही के लिए औद्योगिक उत्पादन के समग्र आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन मार्च की यह मामूली बढ़त संकेत देती है कि लंबे समय से चल रहे ऊर्जा संकट और सप्लाई‑चेन बाधाओं के बाद विनिर्माण क्षेत्र अभी भी दबाव में है।
रोजगार में वृद्धि जारी रही, लेकिन इसकी गति भी काफी कम रही।
Eurostat का अनुमान है कि Q1 2026 में यूरोज़ोन में रोजगार 0.1% बढ़ा — लगभग उतनी ही दर से जितनी जीडीपी बढ़ी।
इसका मतलब है कि श्रम बाज़ार अभी भी अपेक्षाकृत स्थिर है, लेकिन भर्ती की रफ्तार आर्थिक गतिविधि की कमजोरी के साथ धीमी पड़ रही है।
यूरोज़ोन के भीतर आर्थिक प्रदर्शन एक‑सा नहीं रहा।
प्रारंभिक राष्ट्रीय अनुमानों के अनुसार:
ऐसा अंतर यूरोज़ोन की अर्थव्यवस्था में नया नहीं है। विभिन्न देशों की औद्योगिक संरचना, सरकारी खर्च नीतियां और ऊर्जा आयात पर निर्भरता अलग‑अलग होने से आर्थिक प्रदर्शन भी अलग रहता है।
तिमाही के दौरान यूरोज़ोन के आर्थिक दृष्टिकोण के लिए सबसे बड़ा जोखिम मध्य‑पूर्व से जुड़ा ऊर्जा संकट बनकर उभरा।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज़ों में बाधा और क्षेत्रीय तनाव के कारण ऊर्जा बाजारों में तेज प्रतिक्रिया देखी गई:
चूंकि यूरोज़ोन ऊर्जा का बड़ा आयातक है, इसलिए तेल और गैस आपूर्ति में किसी भी व्यवधान का असर उसकी अर्थव्यवस्था पर ज्यादा पड़ता है।
ऊर्जा कीमतों में तेजी यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ECB) की नीति को और जटिल बना सकती है।
ECB के सर्वेक्षण के अनुसार पेशेवर अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि:
लेकिन यदि ऊर्जा संकट लंबा चलता है, तो मुद्रास्फीति अस्थायी रूप से बढ़ सकती है। कुछ आर्थिक अनुमानों के अनुसार मध्य‑पूर्व संघर्ष के कारण 2026 में यूरोज़ोन मुद्रास्फीति लगभग 0.3 प्रतिशत अंक बढ़ सकती है, जबकि जीडीपी लगभग 0.2 प्रतिशत अंक कम हो सकती है।
इससे ECB के सामने कठिन संतुलन बन जाता है: धीमी आर्थिक वृद्धि ब्याज दरों में ढील की ओर इशारा करती है, जबकि बढ़ती ऊर्जा कीमतें मुद्रास्फीति को ऊंचा बनाए रख सकती हैं।
ताजा आंकड़ों को देखें तो यूरोज़ोन की अर्थव्यवस्था बढ़ तो रही है, लेकिन बेहद धीमी गति से।
लेकिन असली जोखिम यूरोप के बाहर से आ रहा है। मध्य‑पूर्व तनाव से जुड़ी ऊर्जा कीमतों की उछाल मुद्रास्फीति बढ़ा सकती है और आर्थिक वृद्धि को और धीमा कर सकती है — जिससे आने वाले महीनों में ECB के लिए नीति बनाना और कठिन हो सकता है।
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