चूंकि चीन दुनिया का सबसे बड़ा कमोडिटी उपभोक्ता है, इसलिए कमजोर औद्योगिक गतिविधि का असर तुरंत वैश्विक बाजारों पर पड़ा। कई ट्रेडरों ने धातुओं जैसे तांबे में अपनी तेजी की पोज़िशन कम करनी शुरू कर दी।
शेयर बाजार के लिए इसका मतलब था कि अगर चीन की वृद्धि धीमी होती है, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कमोडिटी निर्यातकों की कमाई भी प्रभावित हो सकती है।
ऊर्जा बाजार पहले से दबाव में था क्योंकि मध्य‑पूर्व में संघर्ष के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों में बाधा आ रही थी। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है।
चूंकि वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है, इसलिए लंबे समय तक बाधा रहने की आशंका ने ऊर्जा कीमतों को ऊँचा बनाए रखा।
ऊर्जा की कीमतों में उछाल का असर सीधे महंगाई की उम्मीदों पर पड़ा।
बाजार के एक प्रमुख संकेतक—5‑साल का इन्फ्लेशन ब्रेक‑ईवन रेट—करीब 2.7% तक पहुंच गया, जो दर्शाता है कि निवेशक आने वाले वर्षों में ज्यादा महंगाई की आशंका देख रहे हैं।
तेल महंगा होने का असर परिवहन, उत्पादन लागत और उपभोक्ता कीमतों तक फैलता है। इसलिए ऊर्जा झटके अक्सर पूरी अर्थव्यवस्था में महंगाई को बढ़ा देते हैं।
धीमी वृद्धि और ऊँची महंगाई का यह मिश्रण अमेरिकी फेडरल रिजर्व के लिए नीति बनाना मुश्किल कर देता है।
सामान्य तौर पर अगर वैश्विक वृद्धि कमजोर हो, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें कम कर सकते हैं। लेकिन अगर उसी समय महंगाई बढ़ रही हो—जैसे कि तेल कीमतों के कारण—तो दरें घटाना मुश्किल हो जाता है।
हालिया आर्थिक आंकड़ों और बाजार टिप्पणियों से यह धारणा मजबूत हुई कि फेड निकट भविष्य में दरों में कटौती नहीं करेगा।
इस उम्मीद ने अमेरिकी डॉलर को भी मजबूत किया क्योंकि निवेशक सुरक्षित और उच्च प्रतिफल वाले परिसंपत्तियों की ओर झुकने लगे।
जब ये सभी कारक एक साथ सामने आए, तो निवेशकों ने जोखिम वाले निवेशों से दूरी बनानी शुरू कर दी।
शेयर बाजार और वृद्धि‑संवेदनशील परिसंपत्तियां गिरीं क्योंकि कमजोर आर्थिक वृद्धि से कंपनियों की कमाई पर असर पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर, सुरक्षित मानी जाने वाली परिसंपत्तियों—जैसे अमेरिकी डॉलर—की मांग बढ़ गई।
तेल बाजार खुद भी अस्थिर रहा। एक ओर भू‑राजनीतिक जोखिम कीमतों को ऊपर धकेल रहे थे, जबकि दूसरी ओर कमजोर वैश्विक मांग की आशंका उन्हें नीचे खींच रही थी।
इस बाजार गिरावट को गंभीर बनाने वाली बात यह थी कि कई नकारात्मक घटनाएं एक साथ हुईं:
इन सबने मिलकर ऐसा माहौल बनाया जिसमें आर्थिक वृद्धि कमजोर दिख रही थी लेकिन महंगाई का दबाव बना हुआ था। यही वह स्थिति है जिसमें केंद्रीय बैंकों के लिए अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देना सबसे कठिन हो जाता है—और इसी वजह से वैश्विक बाजारों में तेज और व्यापक बिकवाली देखी गई।
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