इस बयान ने ताइवान में चिंता पैदा कर दी कि कहीं वॉशिंगटन का समर्थन बड़े शक्ति‑राजनीतिक सौदे का हिस्सा न बन जाए।
अपने जवाब में राष्ट्रपति लाई ने कहा कि ताइवान किसी दबाव में अपनी संप्रभुता, राष्ट्रीय गरिमा, लोकतांत्रिक व्यवस्था या “स्वतंत्र जीवन‑शैली” नहीं छोड़ेगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि ताइवान का भविष्य केवल उसके लोगों द्वारा तय किया जाना चाहिए—न कि किसी अन्य देश के बीच होने वाली बातचीत में।
यह संदेश एक तरह से वॉशिंगटन और बीजिंग दोनों के लिए था: ताइवान अंतरराष्ट्रीय साझेदारी चाहता है, लेकिन उसकी राजनीतिक स्थिति पर बाहरी फैसला स्वीकार नहीं करेगा।
लाई ने अपने बयान में अमेरिका से हथियार खरीद को भी मजबूती से सही ठहराया। उनके अनुसार यह खरीद “क्षेत्रीय संघर्ष और अस्थिरता को रोकने वाला सबसे महत्वपूर्ण डिटरेंस” है।
हाल के वर्षों में यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि अमेरिका पहले ही लगभग 11 अरब डॉलर का रिकॉर्ड हथियार पैकेज मंजूर कर चुका है, जबकि करीब 14 अरब डॉलर के एक और संभावित सौदे पर विचार चल रहा है।
लाई का कहना है कि क्षेत्र में अस्थिरता का मुख्य कारण चीन का सैन्य दबाव और कूटनीतिक दबाव है। वहीं ताइवान खुद को उकसाने वाली शक्ति के बजाय रक्षात्मक नीति और प्रतिरोधक क्षमता (deterrence) पर जोर देने वाला देश बताता है।
लाई चिंग‑ते की प्रतिक्रिया से ताइवान की व्यापक रणनीति के कुछ प्रमुख संकेत मिलते हैं:
• संप्रभुता सर्वोपरि: ताइवान का भविष्य उसके अपने लोगों द्वारा तय होगा, किसी महाशक्ति की बातचीत में नहीं।
• लोकतांत्रिक पहचान: ताइवान अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं को गैर‑समझौतापरक मानता है।
• सुरक्षा सहयोग: अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग को क्षेत्रीय शांति बनाए रखने का साधन बताया जा रहा है।
• चीन के साथ तनाव: ताइवान का दावा है कि अस्थिरता का मुख्य स्रोत बीजिंग का दबाव है, न कि ताइवान की नीति।
कुल मिलाकर, राष्ट्रपति लाई का संदेश स्पष्ट है: ताइवान अंतरराष्ट्रीय सहयोग चाहता है, लेकिन उसकी राजनीतिक स्थिति या सुरक्षा को किसी बड़ी शक्ति की सौदेबाज़ी का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।
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