ट्रेज़री यील्ड के साथ‑साथ अमेरिकी डॉलर भी मजबूत हुआ, जिसने कीमती धातुओं पर एक और दबाव डाला।
सोना और चांदी अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में कीमत तय करके बेचे जाते हैं। जब डॉलर मजबूत होता है तो अन्य देशों की मुद्राओं में इनकी कीमत प्रभावी रूप से बढ़ जाती है।
इससे वैश्विक खरीदारों की मांग कुछ कम हो सकती है, जो कीमतों को नीचे धकेलती है। विश्लेषकों के अनुसार मजबूत डॉलर और ऊंची यील्ड का यह संयोजन हालिया गिरावट का प्रमुख कारण रहा।
कई ट्रेडिंग सत्रों में यही दोनों ताकतें एक साथ सक्रिय रहीं—और पूरे प्रेशियस मेटल्स बाजार में गिरावट देखने को मिली।
सामान्य परिस्थितियों में भू‑राजनीतिक तनाव—खासतौर पर ऊर्जा बाजार से जुड़ा—सोने को मजबूत करता है क्योंकि निवेशक जोखिम से बचने के लिए सुरक्षित एसेट्स की ओर जाते हैं।
लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी अलग रही। मिडिल ईस्ट तनाव से तेल की कीमतें बढ़ीं और इससे वैश्विक महंगाई के लंबे समय तक बने रहने की आशंका बढ़ गई।
जब महंगाई का खतरा बढ़ता है तो बाजार को लगता है कि केंद्रीय बैंक सख्त मौद्रिक नीति (tighter monetary policy) जारी रखेंगे। यही धारणा सोने के लिए नकारात्मक साबित हुई।
यानी इस बार संघर्ष के महंगाई वाले प्रभाव ने सोने के पारंपरिक safe‑haven लाभ को पीछे छोड़ दिया।
इन सभी कारकों के कारण कीमती धातुओं में व्यापक बिकवाली देखी गई:
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इससे पहले सोना रिकॉर्ड स्तरों के आसपास था, इसलिए गिरावट का एक हिस्सा मुनाफावसूली (profit‑taking) का भी परिणाम माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल बाजार किसी स्पष्ट ट्रेंड में नहीं है। निवेशक अमेरिकी महंगाई और फेडरल रिजर्व की नीति पर नए संकेतों का इंतजार कर रहे हैं।
निकट भविष्य के लिए प्रमुख अनुमान:
हालिया घटनाक्रम यह दिखाता है कि आज के वैश्विक बाजार में मैक्रोइकोनॉमिक ताकतें—जैसे ब्याज दरें, महंगाई और मुद्रा की मजबूती—कभी‑कभी पारंपरिक सुरक्षित निवेश की भूमिका को भी दबा सकती हैं।
यानी भू‑राजनीतिक तनाव के दौर में भी सोना हमेशा नहीं चढ़ता। जब बॉन्ड यील्ड और डॉलर ज्यादा आकर्षक दिखते हैं, तो निवेशक अपना पैसा वहां स्थानांतरित कर देते हैं—और कीमती धातुओं की कीमतें दबाव में आ जाती हैं।
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