ताइवान में बड़ी संख्या में काम करने वाले फिलीपीनो प्रवासी मजदूर फिलीपींस सरकार की सबसे बड़ी चिंता हैं।
मार्कोस ने संकेत दिया कि किसी भी संकट की स्थिति में उनकी सुरक्षा, दूतावास सहायता और संभावित निकासी योजना सरकार की प्राथमिकता होगी।
यही मानवीय जिम्मेदारी भी एक बड़ा कारण है कि फिलीपींस खुद को पूरी तरह अलग नहीं मानता।
मार्कोस ने यह भी स्पष्ट किया कि इन चिंताओं का मतलब यह नहीं है कि फिलीपींस अपनी कूटनीतिक नीति बदल रहा है।
देश अब भी वन‑चाइना नीति का पालन करता है—जिसके तहत बीजिंग को चीन की एकमात्र वैध सरकार माना जाता है और ताइवान को अलग देश के रूप में आधिकारिक मान्यता नहीं दी जाती।
इस तरह मनीला यह संदेश देना चाहता है कि उसकी चिंता मुख्य रूप से सुरक्षा और अपने नागरिकों की रक्षा से जुड़ी है, न कि ताइवान की स्वतंत्रता के सवाल से।
मार्कोस की ये टिप्पणियां ऐसे समय सामने आई हैं जब ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) में तनाव बढ़ रहा है और कई एशियाई देश संभावित संकट के प्रभावों को लेकर चिंतित हैं।
इसी दौरान फिलीपींस ने जापान जैसे साझेदारों के साथ अपने सुरक्षा संबंध भी मजबूत किए हैं। दोनों देशों ने Acquisition and Cross‑Servicing Agreement (ACSA) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत उनकी सेनाएँ संयुक्त गतिविधियों के दौरान एक‑दूसरे को रसद और आपूर्ति उपलब्ध करा सकती हैं।
यह समझौता इंडो‑पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है।
मार्कोस के बयानों से फिलीपींस की एक संतुलित रणनीति सामने आती है:
सरल शब्दों में, फिलीपींस की चुनौती यह है कि भूगोल और नागरिकों की वास्तविकताएँ उसे ताइवान संकट से पूरी तरह अलग रहने की अनुमति शायद ही दें—चाहे वह औपचारिक रूप से किसी पक्ष में खड़ा न भी हो।
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