यहां एक अहम सावधानी जरूरी है: यह दावा विवादित है। CBS की मुख्य जानकारी अनाम अमेरिकी अधिकारियों पर आधारित थी, और NDTV ने रिपोर्ट किया कि एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने नूर खान एयर बेस से जुड़े दावों को खारिज किया ।
समस्या आरोप के सैन्य पहलू से ज्यादा उसके कूटनीतिक संकेत में है। पाकिस्तान अगर सिर्फ दोनों पक्षों से बात कर रहा होता, तो यह मध्यस्थता की सामान्य भूमिका मानी जाती। लेकिन अगर कोई देश एक पक्ष की सैन्य संपत्तियों को संभावित हमलों से बचाने में मदद करता दिखे, तो वह तटस्थ मध्यस्थ कम और उस पक्ष को सुविधा देने वाला राज्य ज्यादा दिखने लगता है।
CBS की रिपोर्ट सही मानी जाए तो पाकिस्तान सिर्फ वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संदेशवाहक नहीं था; वह कथित तौर पर ईरान की सैन्य जोखिम-झेलने की क्षमता को कम कर रहा था, जबकि अमेरिका से खुद को भरोसेमंद मध्यस्थ के तौर पर स्वीकार करने की उम्मीद भी रख रहा था । यही विरोधाभास इस्लामाबाद की स्थिति को कमजोर करता है।
दूसरे शब्दों में, मध्यस्थता में दोनों पक्षों से संपर्क रखना और किसी एक पक्ष की सैन्य संपत्ति को सुरक्षित ठिकाना देना—दो अलग बातें हैं। नूर खान आरोप ने इसी फर्क को राजनीतिक मुद्दा बना दिया।
अब तक सामने आई रिपोर्टिंग में सबसे साफ असर पाकिस्तान की प्रतिष्ठा और राजनीतिक विश्वसनीयता पर दिखता है। Times Now ने बताया कि रिपोर्ट के बाद अमेरिका में आलोचकों, जिनमें रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम भी शामिल बताए गए, ने पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका की समीक्षा की मांग उठाई । The Week ने भी CBS रिपोर्ट के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता की पूरी तरह फिर से समीक्षा की मांगों का जिक्र किया
।
हालांकि उपलब्ध रिपोर्टिंग यह साबित नहीं करती कि पाकिस्तान को औपचारिक रूप से मध्यस्थ की भूमिका से हटा दिया गया। मजबूत और सीमित निष्कर्ष यह है कि नूर खान आरोप ने वॉशिंगटन में पाकिस्तान की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को ठोस राजनीतिक आधार दिया और उसकी मध्यस्थ भूमिका को अधिक संवेदनशील बना दिया ।
रिपोर्टिंग से पाकिस्तान की पूरी नीति-नियत साफ नहीं होती। यह भी उपलब्ध स्रोतों से स्थापित नहीं है कि पाकिस्तान या ईरान ने कथित व्यवस्था को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। केंद्रीय दावा अभी भी अनाम अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से है, जबकि पाकिस्तानी पक्ष से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कथित तौर पर नूर खान एयर बेस के आरोपों को खारिज किया ।
इसलिए मामला दो स्तरों पर पढ़ा जाना चाहिए: एक, आरोप ने पाकिस्तान की कूटनीतिक छवि को नुकसान पहुंचाया; दो, अभी यह साबित नहीं है कि इस्लामाबाद ने रणनीतिक रूप से ईरान की मदद करने का फैसला लिया था या कथित विमान गतिविधि के पीछे कोई और कारण था।
अगर CBS की रिपोर्ट सही है, तो ईरानी सैन्य विमानों को नूर खान एयर बेस या पाकिस्तानी एयरफील्ड पर जगह देने का कथित फैसला पाकिस्तान की तटस्थ मध्यस्थ छवि के लिए गंभीर झटका था। मध्यस्थ की भूमिका भरोसे पर टिकती है, और एक पक्ष की सैन्य संपत्ति को सुरक्षित रखने की धारणा उस भरोसे को कमजोर कर देती है।
सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है: नूर खान आरोप ने पाकिस्तान की निष्पक्षता की धारणा को नुकसान पहुंचाया और अमेरिकी आलोचकों को उसकी मध्यस्थ भूमिका पर सवाल उठाने का मौका दिया, लेकिन पाकिस्तान की मंशा और किसी औपचारिक कूटनीतिक परिणाम पर अभी निर्णायक प्रमाण सामने नहीं है ।
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