इस घटना से तत्काल सैन्य संकट पैदा नहीं हुआ, लेकिन इसने एक सीमित भरोसा बढ़ाने वाली पहल की सीमा जरूर उजागर कर दी। प्योंगयांग के कदम से संकेत मिलता है कि केवल सैन्य अभ्यासों का दायरा घटाना बातचीत में उसकी वापसी के लिए पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर कोरिया अब भी अमेरिका की कथित “शत्रुतापूर्ण नीति” खत्म करने और अपने परमाणु दर्जे को स्वीकार कराने की मांग पर कायम है।
दक्षिण कोरियाई सेना ने स्थानीय समयानुसार शाम करीब 5 बजे प्रक्षेपणों का पता लगाया और अमेरिकी अधिकारियों के साथ मिसाइलों की तकनीकी विशेषताओं का विस्तृत आकलन शुरू किया। जापान ने भी कम-से-कम एक संदिग्ध बैलिस्टिक मिसाइल का पता लगाया। टोक्यो के आकलन के मुताबिक, वह मिसाइल जापान के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी EEZ के बाहर गिरी। जापान के तटरक्षक बल ने जहाजों को किसी नुकसान की सूचना नहीं दी।
फिर भी अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान के बीच तेजी से खुफिया जानकारी साझा करना जरूरी था। ऐसे समन्वय से तीनों देश प्रक्षेपणों की संख्या, उड़ान-पथ, दूरी और गिरने के स्थान की पुष्टि कर पाते हैं। इसके बाद ही वे संयुक्त प्रतिक्रिया पर फैसला ले सकते हैं। बाद में तीनों सरकारों ने एक फोन वार्ता कर मिसाइल बैराज पर चर्चा की और अपनी प्रतिक्रिया में तालमेल बनाया।
मिसाइलों के किसी देश के भूभाग पर न गिरने या जापान के EEZ में प्रवेश न करने से यह जरूरत खत्म नहीं होती। एक साथ कई मिसाइलों का प्रक्षेपण चेतावनी प्रणालियों की परीक्षा ले सकता है और यह भी दिखा सकता है कि पड़ोसी देश एक ही घटना को कितनी जल्दी और किस तरह पहचानते हैं। कूटनीतिक अनिश्चितता के दौर में सियोल और टोक्यो के लिए सैन्य संपर्क बनाए रखना इसलिए व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है।
दक्षिण कोरिया ने इन प्रक्षेपणों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का गंभीर उल्लंघन बताया। इन प्रस्तावों के तहत उत्तर कोरिया की बैलिस्टिक-मिसाइल गतिविधियों पर रोक है। सियोल ने आपात सुरक्षा बैठक बुलाई और सेना को पूरी तरह तैयार रहने का आदेश दिया।
जापान ने भी इसे क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति से जुड़ा मामला माना, भले ही मिसाइल के उसके विशेष आर्थिक क्षेत्र के बाहर गिरने का आकलन किया गया था। उपलब्ध रिपोर्टिंग जापान द्वारा प्रक्षेपण का पता लगाने और गिरने की जगह के आकलन की पुष्टि करती है, लेकिन जापान ने किस सटीक भाषा या किस कूटनीतिक माध्यम से विरोध दर्ज कराया, यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं करती।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। तत्काल नुकसान न होना कानूनी या सुरक्षा संबंधी चिंता को खत्म नहीं करता। सहयोगियों की आपत्ति स्वयं प्रतिबंधित बैलिस्टिक-मिसाइल गतिविधि और लगातार परीक्षणों से पैदा होने वाले क्षेत्रीय अस्थिरता के जोखिम पर केंद्रित थी।
अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने पहले उल्ची फ्रीडम शील्ड अभ्यास 17 से 27 अगस्त तक आयोजित करने की योजना बनाई थी। 19 अगस्त को दोनों ने घोषणा की कि अमेरिकी अनुरोध पर अभ्यास का दूसरा हिस्सा रद्द किया जाएगा, जिससे इसका दायरा घट गया।
यह फैसला कूटनीति के लिए जगह बनाने की कोशिश के रूप में देखा गया। लेकिन किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने इस कटौती को टिप्पणी के लायक भी नहीं बताया, हालांकि उन्होंने ट्रंप और किम जोंग उन के रिश्ते को “उत्कृष्ट” कहा। इसके अगले दिन हुआ मिसाइल प्रक्षेपण इस संदेश को और मजबूत करता है कि प्योंगयांग आंशिक सैन्य कटौती को पर्याप्त रियायत नहीं मानता।
इससे यह साबित नहीं होता कि अभ्यास में कटौती के फैसले ने सीधे तौर पर मिसाइल प्रक्षेपण करवाए। लेकिन इतना जरूर दिखता है कि कटौती के बाद उत्तर कोरिया की हथियार गतिविधि में कोई स्पष्ट विराम नहीं आया। प्योंगयांग ने राजनीतिक संदेशों के साथ मिसाइल प्रदर्शन जारी रखा, बजाय इसके कि वह अमेरिकी कदम को पारस्परिक तनाव-घटाने की प्रक्रिया की शुरुआत माने।
19 अगस्त को ट्रंप ने कहा कि वह 2026 में किम जोंग उन से मिलने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उत्तर कोरिया के पास 57 “बहुत शक्तिशाली” परमाणु हथियार हैं। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार, अमेरिकी सरकार उत्तर कोरिया के परमाणु भंडार की कोई निर्णायक सार्वजनिक सूची जारी नहीं करती।
एक दिन बाद दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बेक ने कहा कि उत्तर कोरिया के पास अनुमानतः 80 से 120 परमाणु हथियार हो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दायरा निजी शोध संस्थाओं के अनुमानों पर आधारित है और दक्षिण कोरियाई सेना का पुष्ट आकलन नहीं है।
इन अलग-अलग आंकड़ों को अंतिम संख्या नहीं माना जाना चाहिए। उनका महत्व राजनीतिक और रणनीतिक है। वे दिखाते हैं कि ऐसे परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत कितनी कठिन होगी, जिसका आकार और क्षमता स्वतंत्र रूप से सटीक रूप से सत्यापित नहीं की जा सकती। ट्रंप द्वारा बताए गए निचले आंकड़े को भी सही मानें, तो यह उत्तर कोरिया की जड़ जमा चुकी परमाणु क्षमता को दर्शाता है; वहीं सियोल का ऊंचा अनुमान बातचीत को और जटिल बनाता है।
मिसाइल बैराज से संकेत मिलता है कि केवल शिखर वार्ता केंद्रीय मतभेदों को हल नहीं कर पाएगी। ट्रंप शीर्ष स्तर पर फिर संपर्क के इच्छुक दिखते हैं, लेकिन प्योंगयांग का व्यवहार बताता है कि वह सैन्य क्षमता को बातचीत में दबाव बनाने के साधन के रूप में देखता है। उसने कूटनीतिक संपर्क के बदले परीक्षणों पर रोक को स्वीकार करने के संकेत भी नहीं दिए हैं।
उत्तर कोरिया की स्थिति 2018–2019 जैसी वार्ता प्रक्रिया में तेजी से लौटना भी मुश्किल बनाती है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार, प्योंगयांग बातचीत की शुरुआती शर्त के रूप में निरस्त्रीकरण स्वीकार करने के बजाय अपने परमाणु दर्जे की मान्यता और अमेरिकी शत्रुतापूर्ण नीति के अंत की मांग कर रहा है। इसी बीच रूस के साथ उसके रणनीतिक संबंध अधिक महत्वपूर्ण हुए हैं, जिनमें यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध के लिए कथित समर्थन भी शामिल है।
इसलिए निकट भविष्य के यथार्थवादी लक्ष्य पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण से छोटे हो सकते हैं—सैन्य और कूटनीतिक संपर्क दोबारा शुरू करना, गलत आकलन का जोखिम घटाना, परीक्षणों पर कुछ सीमाएं तय करना और सत्यापन योग्य रोक की संभावनाएं तलाशना।
ट्रंप-किम बैठक इन उपायों के लिए अवसर पैदा कर सकती है, लेकिन 20 अगस्त के प्रक्षेपणों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कूटनीति की शुरुआत पहले से स्थापित परमाणु और मिसाइल खतरे को संभालने से होगी। यह उम्मीद करना मुश्किल है कि उत्तर कोरिया तुरंत अपने परमाणु हथियार छोड़ने के लिए तैयार है।
इस घटना से तत्काल सैन्य संकट पैदा नहीं हुआ, लेकिन इसने एक सीमित भरोसा बढ़ाने वाली पहल की सीमा जरूर उजागर कर दी। प्योंगयांग के कदम से संकेत मिलता है कि केवल सैन्य अभ्यासों का दायरा घटाना बातचीत में उसकी वापसी के लिए पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर कोरिया अब भी अमेरिका की कथित “शत्रुतापूर्ण नीति” खत्म करने और अपने परमाणु दर्जे को स्वीकार कराने की मांग पर कायम है।
दक्षिण कोरियाई सेना ने स्थानीय समयानुसार शाम करीब 5 बजे प्रक्षेपणों का पता लगाया और अमेरिकी अधिकारियों के साथ मिसाइलों की तकनीकी विशेषताओं का विस्तृत आकलन शुरू किया। जापान ने भी कम-से-कम एक संदिग्ध बैलिस्टिक मिसाइल का पता लगाया। टोक्यो के आकलन के मुताबिक, वह मिसाइल जापान के विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी EEZ के बाहर गिरी। जापान के तटरक्षक बल ने जहाजों को किसी नुकसान की सूचना नहीं दी।
फिर भी अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान के बीच तेजी से खुफिया जानकारी साझा करना जरूरी था। ऐसे समन्वय से तीनों देश प्रक्षेपणों की संख्या, उड़ान-पथ, दूरी और गिरने के स्थान की पुष्टि कर पाते हैं। इसके बाद ही वे संयुक्त प्रतिक्रिया पर फैसला ले सकते हैं। बाद में तीनों सरकारों ने एक फोन वार्ता कर मिसाइल बैराज पर चर्चा की और अपनी प्रतिक्रिया में तालमेल बनाया।
मिसाइलों के किसी देश के भूभाग पर न गिरने या जापान के EEZ में प्रवेश न करने से यह जरूरत खत्म नहीं होती। एक साथ कई मिसाइलों का प्रक्षेपण चेतावनी प्रणालियों की परीक्षा ले सकता है और यह भी दिखा सकता है कि पड़ोसी देश एक ही घटना को कितनी जल्दी और किस तरह पहचानते हैं। कूटनीतिक अनिश्चितता के दौर में सियोल और टोक्यो के लिए सैन्य संपर्क बनाए रखना इसलिए व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है।
दक्षिण कोरिया ने इन प्रक्षेपणों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का गंभीर उल्लंघन बताया। इन प्रस्तावों के तहत उत्तर कोरिया की बैलिस्टिक-मिसाइल गतिविधियों पर रोक है। सियोल ने आपात सुरक्षा बैठक बुलाई और सेना को पूरी तरह तैयार रहने का आदेश दिया।
जापान ने भी इसे क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति से जुड़ा मामला माना, भले ही मिसाइल के उसके विशेष आर्थिक क्षेत्र के बाहर गिरने का आकलन किया गया था। उपलब्ध रिपोर्टिंग जापान द्वारा प्रक्षेपण का पता लगाने और गिरने की जगह के आकलन की पुष्टि करती है, लेकिन जापान ने किस सटीक भाषा या किस कूटनीतिक माध्यम से विरोध दर्ज कराया, यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं करती।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। तत्काल नुकसान न होना कानूनी या सुरक्षा संबंधी चिंता को खत्म नहीं करता। सहयोगियों की आपत्ति स्वयं प्रतिबंधित बैलिस्टिक-मिसाइल गतिविधि और लगातार परीक्षणों से पैदा होने वाले क्षेत्रीय अस्थिरता के जोखिम पर केंद्रित थी।
अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने पहले उल्ची फ्रीडम शील्ड अभ्यास 17 से 27 अगस्त तक आयोजित करने की योजना बनाई थी। 19 अगस्त को दोनों ने घोषणा की कि अमेरिकी अनुरोध पर अभ्यास का दूसरा हिस्सा रद्द किया जाएगा, जिससे इसका दायरा घट गया।
यह फैसला कूटनीति के लिए जगह बनाने की कोशिश के रूप में देखा गया। लेकिन किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने इस कटौती को टिप्पणी के लायक भी नहीं बताया, हालांकि उन्होंने ट्रंप और किम जोंग उन के रिश्ते को “उत्कृष्ट” कहा। इसके अगले दिन हुआ मिसाइल प्रक्षेपण इस संदेश को और मजबूत करता है कि प्योंगयांग आंशिक सैन्य कटौती को पर्याप्त रियायत नहीं मानता।
इससे यह साबित नहीं होता कि अभ्यास में कटौती के फैसले ने सीधे तौर पर मिसाइल प्रक्षेपण करवाए। लेकिन इतना जरूर दिखता है कि कटौती के बाद उत्तर कोरिया की हथियार गतिविधि में कोई स्पष्ट विराम नहीं आया। प्योंगयांग ने राजनीतिक संदेशों के साथ मिसाइल प्रदर्शन जारी रखा, बजाय इसके कि वह अमेरिकी कदम को पारस्परिक तनाव-घटाने की प्रक्रिया की शुरुआत माने।
19 अगस्त को ट्रंप ने कहा कि वह 2026 में किम जोंग उन से मिलने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उत्तर कोरिया के पास 57 “बहुत शक्तिशाली” परमाणु हथियार हैं। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार, अमेरिकी सरकार उत्तर कोरिया के परमाणु भंडार की कोई निर्णायक सार्वजनिक सूची जारी नहीं करती।
एक दिन बाद दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बेक ने कहा कि उत्तर कोरिया के पास अनुमानतः 80 से 120 परमाणु हथियार हो सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दायरा निजी शोध संस्थाओं के अनुमानों पर आधारित है और दक्षिण कोरियाई सेना का पुष्ट आकलन नहीं है।
इन अलग-अलग आंकड़ों को अंतिम संख्या नहीं माना जाना चाहिए। उनका महत्व राजनीतिक और रणनीतिक है। वे दिखाते हैं कि ऐसे परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत कितनी कठिन होगी, जिसका आकार और क्षमता स्वतंत्र रूप से सटीक रूप से सत्यापित नहीं की जा सकती। ट्रंप द्वारा बताए गए निचले आंकड़े को भी सही मानें, तो यह उत्तर कोरिया की जड़ जमा चुकी परमाणु क्षमता को दर्शाता है; वहीं सियोल का ऊंचा अनुमान बातचीत को और जटिल बनाता है।
मिसाइल बैराज से संकेत मिलता है कि केवल शिखर वार्ता केंद्रीय मतभेदों को हल नहीं कर पाएगी। ट्रंप शीर्ष स्तर पर फिर संपर्क के इच्छुक दिखते हैं, लेकिन प्योंगयांग का व्यवहार बताता है कि वह सैन्य क्षमता को बातचीत में दबाव बनाने के साधन के रूप में देखता है। उसने कूटनीतिक संपर्क के बदले परीक्षणों पर रोक को स्वीकार करने के संकेत भी नहीं दिए हैं।
उत्तर कोरिया की स्थिति 2018–2019 जैसी वार्ता प्रक्रिया में तेजी से लौटना भी मुश्किल बनाती है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार, प्योंगयांग बातचीत की शुरुआती शर्त के रूप में निरस्त्रीकरण स्वीकार करने के बजाय अपने परमाणु दर्जे की मान्यता और अमेरिकी शत्रुतापूर्ण नीति के अंत की मांग कर रहा है। इसी बीच रूस के साथ उसके रणनीतिक संबंध अधिक महत्वपूर्ण हुए हैं, जिनमें यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध के लिए कथित समर्थन भी शामिल है।
इसलिए निकट भविष्य के यथार्थवादी लक्ष्य पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण से छोटे हो सकते हैं—सैन्य और कूटनीतिक संपर्क दोबारा शुरू करना, गलत आकलन का जोखिम घटाना, परीक्षणों पर कुछ सीमाएं तय करना और सत्यापन योग्य रोक की संभावनाएं तलाशना।
ट्रंप-किम बैठक इन उपायों के लिए अवसर पैदा कर सकती है, लेकिन 20 अगस्त के प्रक्षेपणों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कूटनीति की शुरुआत पहले से स्थापित परमाणु और मिसाइल खतरे को संभालने से होगी। यह उम्मीद करना मुश्किल है कि उत्तर कोरिया तुरंत अपने परमाणु हथियार छोड़ने के लिए तैयार है।