शोधकर्ताओं ने बैक्टीरियल कॉलोनियों को अगर पर छोटे-छोटे बिंदुओं के रूप में प्रिंट किया। पड़ोसी कॉलोनियों के बीच दूरी लगभग 5 मिलीमीटर रखी गई, ताकि रासायनिक संकेत एक कॉलोनी से दूसरी तक पहुँच सकें और आगे रिले हो सकें।
प्रयोग की प्रक्रिया में पहले सर्किट का लेआउट तय किया गया। इसके बाद अलग-अलग इंजीनियर्ड स्ट्रेन को उगाकर प्रिंटिंग के लिए तैयार किया गया और चयनित पैटर्न के अनुसार अगर पर जमा किया गया। प्रयोगात्मक प्रोटोकॉल में स्ट्रेन को चयनात्मक अगर पर उगाने और फिर उन्हें प्रिंटिंग के लिए तैयार करने के चरण बताए गए हैं।
नई गणना के लिए शोधकर्ताओं को केवल यह बदलना था कि कौन-सा स्ट्रेन किस स्थान पर प्रिंट होगा और उसके पड़ोस में कौन-सी कॉलोनी होगी। इस तरह आनुवंशिक इंजीनियरिंग तय करती है कि कोई स्ट्रेन क्या कर सकता है, जबकि प्रिंट किया गया लेआउट तय करता है कि वे क्षमताएँ आपस में कैसे जुड़ेंगी।
टीम ने धीरे-धीरे अधिक जटिल जैविक लॉजिक सर्किट बनाए, जिनमें शामिल थे:
फुल-ऐडर के प्रदर्शन में 24 प्रिंटेड बैक्टीरियल कॉलोनियों का इस्तेमाल हुआ। इससे यह दिखा कि गणना को एक ही, अत्यधिक बोझ वाली कोशिका में सीमित रखने के बजाय सहयोग करती हुई कई कॉलोनियों में बाँटा जा सकता है।
इन जीवित सर्किटों को एक गणना पूरी करने में लगभग आठ घंटे लगे। सिलिकॉन आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स की तुलना में यह बेहद धीमा है, जहाँ लॉजिक ऑपरेशन आम तौर पर नैनोसेकंड या उससे भी कम समय-मान पर होते हैं। इसलिए यह तकनीक पारंपरिक कंप्यूटर प्रोसेसर की जगह लेने के लिए नहीं बनाई गई है।
इसका संभावित लाभ गति नहीं, बल्कि जैविक परिस्थितियों में स्थानीय और स्वायत्त प्रतिक्रिया है। पौधों में सूखे का तनाव, कीटों का हमला या रोग का विकास अक्सर घंटों या दिनों में होता है। ऐसे मामलों में आठ घंटे में किसी संकेत को पहचानकर जैविक प्रतिक्रिया शुरू करना उपयोगी हो सकता है।
दूसरे शब्दों में, यह तकनीक इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटिंग की तेज़ी के बदले जैविक वातावरण के साथ सीधे एकीकरण का विकल्प देती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, भविष्य में ऐसे सर्किट पौधों से जुड़े वातावरण में लगाए जा सकते हैं। किसी जड़ या पत्ती पर मौजूद सर्किट सूखे, कीट-हमले या रोगजनक से जुड़े संकेतों को एक साथ पढ़ सकता है और केवल सही संकेत-पैटर्न मिलने पर प्रतिक्रिया शुरू कर सकता है।
संभावित प्रतिक्रिया के तौर पर किसी फफूंदनाशक यौगिक या अन्य पौध-सुरक्षात्मक पदार्थ का उत्पादन सोचा जा सकता है। यह अभी एक शोध-दिशा है, तैयार कृषि उत्पाद नहीं। फिर भी यह उदाहरण बताता है कि रासायनिक कंप्यूटिंग धीमी होने के बावजूद उन जगहों पर उपयोगी हो सकती है जहाँ समस्या खुद जैविक गति से विकसित होती है।
पारंपरिक जेनेटिक-सर्किट डिजाइन का एक सवाल यह रहा है कि एक ही कोशिका में कितने कार्य भरे जा सकते हैं। MIT की व्यवस्था सवाल को बदल देती है: अलग-अलग कार्यों को कितनी कॉलोनियों में बाँटना चाहिए और उन कॉलोनियों को किस क्रम में रखना चाहिए?
इस विभाजन से एकल कोशिकाओं पर प्रोटीन-उत्पादन का बोझ कम हो सकता है। साथ ही, भौतिक लेआउट प्रोग्रामिंग की एक अतिरिक्त परत बन जाता है। विशेषीकृत हिस्सों की छोटी लाइब्रेरी से नए सर्किट तैयार करने का यह तरीका हर नई लॉजिक डिजाइन के लिए पूरी तरह नया बैक्टीरियल स्ट्रेन बनाने की जरूरत घटा सकता है।