लुई वीटों ने चीनी टी-चेन मॉली टी के खिलाफ ट्रेडमार्क मुकदमा तो जीत लिया, लेकिन चीन में जनमत उसके पक्ष में नहीं गया। सूझोउ की एक अदालत ने माना कि मॉली टी का फूलों वाला लोगो लुई वीटों के पंजीकृत चार-पंखुड़ी चिह्नों का उल्लंघन करता है और फ्रांसीसी लक्जरी ब्रांड को 1.03 करोड़ युआन (करीब 15 लाख डॉलर) देने का आदेश दिया। इसके तुरंत बाद यह मामला लोगो की समानता से कहीं बड़ी बहस बन गया—चीनी सांस्कृतिक प्रतीकों, कॉरपोरेट ताकत और राष्ट्रीय भावनाओं की बहस।
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अदालत का फैसला क्या था
सूझोउ इंटरमीडिएट पीपल्स कोर्ट ने कहा कि शेनझेन स्थित मॉली टी और उससे जुड़ी एक दुकान ने लुई वीटों के सात पंजीकृत चार-पंखुड़ी फूल-आकृति वाले ग्राफिक ट्रेडमार्क के अधिकारों का उल्लंघन किया। मुआवजे में 1 करोड़ युआन आर्थिक नुकसान के लिए और 3 लाख युआन मुकदमे के उचित खर्च के लिए शामिल बताए गए।
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मॉली टी ने कहा कि वह अपील करेगी। इसलिए रिपोर्ट किया गया फैसला प्रथम-स्तर का निर्णय है, अंतिम कानूनी निपटारा नहीं। कानूनी रिपोर्टिंग के अनुसार फैसला आधिकारिक रिपोर्टर में प्रकाशित नहीं हुआ है और सार्वजनिक रूप से इसकी सीमित सामग्री ही उपलब्ध है।
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मामला देशभक्ति वाले विरोध में कैसे बदला
ऑनलाइन बहस सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं रही कि ट्रेडमार्क कानून के तहत दोनों लोगो पर्याप्त रूप से मिलते-जुलते हैं या नहीं। चीन के सरकारी मीडिया और सोशल मीडिया टिप्पणीकारों ने सवाल उठाया कि चार-पंखुड़ी वाले फूल को—खासकर अगर उसका संबंध प्राचीन चीनी सजावटी रूपांकनों से माना जाता हो—क्या किसी यूरोपीय लक्जरी लेबल से विशेष रूप से जोड़ा जा सकता है।
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मॉली टी के समर्थकों ने उसके डिजाइन को बाओश्यांगहुआ से जोड़ा, जिसे तांग राजवंश के दौर का “कीमती फूल” पैटर्न कहा जाता है। उन्होंने इसे एक वैश्विक लक्जरी समूह और एक अपेक्षाकृत छोटी स्थानीय पेय श्रृंखला के बीच टकराव के रूप में भी देखा, जो लुई वीटों के मुख्य फैशन कारोबार से सीधे प्रतिस्पर्धा नहीं करती। इसीलिए मॉली टी का बचाव कई लोगों के लिए स्थानीय संस्कृति और घरेलू व्यवसाय के समर्थन का प्रतीक बन गया।
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विवाद को मिली पहुंच भी बड़ी थी। बीबीसी के अनुसार, इस मामले से जुड़े एक हैशटैग को 40 करोड़ से अधिक बार देखा गया और उस पर हजारों टिप्पणियां आईं।
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कमजोर लक्जरी बाजार के बीच आया विवाद
यह विरोध ऐसे समय उभरा, जब चीन का लक्जरी बाजार पहले से ही सुस्त था। ब्लूमबर्ग द्वारा सर्वे की गई तीन रिसर्च फर्मों के अनुसार, जुलाई में चीन के 25 सबसे बड़े लक्जरी लेबलों की बिक्री 10% से अधिक गिरी। रिपोर्ट में कमजोर मांग और विदेशों में रखी संपत्ति पर कर लगाने के चीनी अभियान को इस व्यापक सुस्ती से जोड़ा गया।
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इसी पृष्ठभूमि में ब्लूमबर्ग ने बताया कि जुलाई और अगस्त में प्रमुख लक्जरी ब्रांडों में लुई वीटों सबसे अधिक प्रभावित रहा। मामले से परिचित लोगों ने इस कमजोरी का एक हिस्सा मॉली टी विवाद पर सोशल मीडिया नाराजगी को बताया।
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रिसर्च फर्म जेएल वॉरेन कैपिटल ने अनुमान लगाया कि चीन में लुई वीटों की बिक्री जुलाई में करीब 30% घटी और अगस्त में 20% से 25% और कम हुई। ये कंपनी द्वारा जारी आधिकारिक नतीजे नहीं, बल्कि तीसरे पक्ष के अनुमान हैं; इसलिए इन्हें सिर्फ विवाद के प्रभाव का सटीक पैमाना नहीं माना जा सकता।
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सावधान निष्कर्ष यही है कि मुकदमे ने पूरे बाजार में चल रही गिरावट को संभवतः और गहरा किया, उसे अकेले पैदा नहीं किया। उपलब्ध रिपोर्टिंग के आधार पर बिक्री में आई कमी का कोई निश्चित हिस्सा सिर्फ ट्रेडमार्क विवाद को नहीं सौंपा जा सकता।
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लुई वीटों की सीमित सार्वजनिक प्रतिक्रिया का मतलब
रिपोर्टों में कहा गया कि विवाद के चरम पर डोयिन, वीबो और श्याओहोंगशू पर लुई वीटों के अकाउंट काफी हद तक शांत रहे।
22 सार्वजनिक प्रतिक्रिया सीमित रखने से ऑनलाइन विवाद को और फैलने से रोका जा सकता है, लेकिन इससे विरोधी पक्ष की प्रमुख कथा का जवाब भी नहीं दिया जाता। उपलब्ध स्रोत कंपनी की अंदरूनी रणनीति नहीं बताते और किसी रद्द या घोषित न हुई शंघाई गतिविधि के दावे की पुष्टि भी नहीं करते।
इसी तरह, उपलब्ध साक्ष्य मॉली टी द्वारा लोगो का रंग बदलने, लुई वीटों के सीईओ पिएत्रो बेकारी या डिप्टी सीईओ डेमियन बर्ट्रांड की किसी विशिष्ट प्रतिक्रिया, अथवा प्रबंधन-परिवर्तन योजना में बदलाव की पुष्टि नहीं करते। मजबूत सबूत के बिना इन्हें स्थापित तथ्य नहीं कहा जाना चाहिए।
ब्रांडों के लिए सबक: कानूनी अधिकार ही पूरा जोखिम नहीं हैं
यह मामला चीन में काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के सामने एक अहम चुनौती दिखाता है: ट्रेडमार्क लागू कराया जा सकता है, लेकिन उसे लागू कराने के आसपास बनी सार्वजनिक कहानी ब्रांड के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। उपभोक्ता केवल यह नहीं पूछ रहे थे कि लुई वीटों के पास पंजीकृत चिह्न हैं या नहीं। वे यह भी पूछ रहे थे कि क्या ब्रांड उस रूपांकन पर सांस्कृतिक स्वामित्व जता रहा है, जिसे बहुत से लोग चीनी विरासत से जुड़ा मानते हैं—और क्या स्थानीय टी-चेन के खिलाफ कार्रवाई अनुपातहीन लगी।
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वैश्विक ब्रांडों के लिए यहां दो अलग कसौटियां हैं:
- कानूनी मजबूती: क्या दावा पंजीकृत अधिकारों और लागू कानून के आधार पर टिकता है?
- सांस्कृतिक स्वीकार्यता: स्थानीय विरासत, राष्ट्रीय भावनाओं और निष्पक्षता की धारणा के संदर्भ में उपभोक्ता उस कार्रवाई को कैसे देखेंगे?
मॉली टी विवाद बताता है कि पहली कसौटी पर सफल होना दूसरी पर सफलता की गारंटी नहीं है। नाजुक उपभोक्ता बाजार में अदालत की जीत भी प्रतिष्ठा पर बोझ बन सकती है, जब ऑनलाइन दर्शक किसी स्थानीय कंपनी को कमजोर पक्ष मानकर उसके साथ खड़े हो जाएं।
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