ये नियम उन प्रमुख HS कोड श्रेणियों पर लागू होते हैं जो वैश्विक बुलियन ट्रेड में आम तौर पर इस्तेमाल होती हैं। चूंकि भारत अपनी खपत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय मांग को कमजोर कर सकता है।
हालांकि इससे भारत के घरेलू बाजार में सप्लाई कम होकर प्रीमियम बढ़ सकते हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह संकेत देता है कि दुनिया के बड़े खरीदारों में से एक की आयात गति धीमी पड़ सकती है—और यही वजह कीमतों पर दबाव डाल सकती है।
इसी समय वैश्विक मैक्रो आर्थिक माहौल भी कीमती धातुओं के लिए कम अनुकूल हो गया।
अमेरिका में ताजा महंगाई के आंकड़ों ने इस संभावना को बढ़ा दिया कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को ज्यादा समय तक ऊंचा रख सकता है। जब ब्याज दरें बढ़ती हैं या ऊंची रहती हैं, तो आम तौर पर अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है और वास्तविक यील्ड बढ़ती है—दोनों ही सोना और चांदी जैसी बिना ब्याज वाली संपत्तियों पर दबाव डालते हैं।
इन्हीं कारणों के बीच बाजार में बिकवाली तेज हुई और चांदी की कीमतें 6% से अधिक गिरकर लगभग 79 डॉलर प्रति औंस से नीचे आ गईं।
चांदी को सिर्फ औद्योगिक धातु ही नहीं बल्कि एक मौद्रिक (monetary) धातु भी माना जाता है, इसलिए वित्तीय स्थितियां कड़ी होने पर निवेशक अक्सर इसमें अपनी पोजिशन कम कर देते हैं।
तीसरा बड़ा झटका तब आया जब स्विस बैंक UBS ने चांदी के बाजार के सप्लाई‑डिमांड संतुलन को लेकर अपना अनुमान नीचे कर दिया।
UBS के विश्लेषकों के मुताबिक निवेश मांग कमजोर पड़ रही है, औद्योगिक खपत उतनी मजबूत नहीं दिख रही और खदानों से सप्लाई बढ़ रही है। इन वजहों से वैश्विक चांदी बाजार में अनुमानित सप्लाई‑डिफिसिट काफी कम हो सकता है।
पिछले कुछ सालों में चांदी की तेजी का बड़ा तर्क यही था कि बाजार में संरचनात्मक कमी बनी रहेगी। जब इस कहानी पर सवाल उठे, तो निवेशकों का भरोसा भी कमजोर पड़ा और फ्यूचर्स मार्केट में तेज गिरावट देखने को मिली।
अगर इन कारकों को अलग‑अलग देखें तो शायद असर सीमित होता, लेकिन एक साथ आने से बाजार को बड़ा झटका लगा।
इन संकेतों ने ट्रेडर्स को मुनाफावसूली (profit‑taking) के लिए प्रेरित किया, जिससे कीमतों में तेज गिरावट आई।
निकट अवधि में चांदी का बाजार पहले की तुलना में ज्यादा नाजुक दिखाई दे रहा है। यदि अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर सख्ती की उम्मीद बनी रहती है और भारत में आयात धीमा पड़ता है, तो कीमतों को फिर से तेज गति पकड़ने में समय लग सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल बाजार में कुछ समय तक स्थिरता या हल्का दबाव देखने को मिल सकता है, जब तक कोई नया सकारात्मक ट्रिगर सामने नहीं आता।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि चांदी की दीर्घकालिक कहानी खत्म हो गई है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक मांग अभी भी मजबूत खपत का बड़ा आधार है।
यदि औद्योगिक मांग फिर से तेज होती है या सप्लाई सीमित रहती है, तो भविष्य में कीमतों पर फिर से ऊपर की ओर दबाव बन सकता है।
फिलहाल के लिए, चांदी का बाजार एक नए संतुलन की तलाश में है—जहां निवेशक सप्लाई की कमी से ज्यादा मांग, मौद्रिक नीति और वैश्विक आर्थिक संकेतों पर नजर रख रहे हैं।