सामान्य परिस्थितियों में यह सोने के लिए सकारात्मक हो सकता था, लेकिन बाजार ने इसे अलग तरह से देखा। निवेशकों ने मान लिया कि अगर महंगाई बनी रहती है तो फेडरल रिज़र्व को नीतियां कड़ी रखनी पड़ेंगी या दरों में कटौती टालनी पड़ सकती है।
इस हॉकिश फेड उम्मीद ने सोने पर और दबाव डाला, क्योंकि सख्त मौद्रिक नीति आम तौर पर डॉलर और वास्तविक यील्ड्स को ऊपर ले जाती है—जो सोने के लिए नकारात्मक होती हैं।
सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमत अमेरिकी डॉलर में तय होती है। जब डॉलर मजबूत होता है तो अन्य देशों के खरीदारों के लिए सोना महंगा पड़ता है।
उसी समय जब ट्रेजरी यील्ड्स बढ़ रही थीं, डॉलर भी मजबूत हुआ। इससे सोने की कीमतों में गिरावट और तेज हो गई और कुछ निवेशकों ने लीवरेज्ड कमोडिटी पोज़िशन भी कम कर दीं।
इस तरह ऊंची यील्ड्स + मजबूत डॉलर का संयोजन सुरक्षित निवेश की मांग पर भारी पड़ गया।
महंगाई और तेल की कीमतों में तेजी ने निवेशकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि फेड जल्दी दरें कम नहीं करेगा।
जहां पहले बाजार तेज दर कटौती की उम्मीद कर रहा था, वहीं अब धारणा बनी कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। यह बदलाव महत्वपूर्ण था क्योंकि सोना आम तौर पर तब बेहतर प्रदर्शन करता है जब वास्तविक ब्याज दरें गिरती हैं या दर कटौती का चक्र शुरू होने वाला होता है।
एक बार जब कीमतें गिरना शुरू हुईं तो तकनीकी स्तर टूटने से ट्रेडरों की बिक्री और बढ़ गई।
मजबूत डॉलर, बढ़ती यील्ड्स और कमजोर होती तकनीकी संरचना ने मिलकर शॉर्ट‑टर्म ट्रेडिंग दबाव पैदा किया। कई रिपोर्टों में इसे व्यापक कमोडिटी बिकवाली के माहौल का हिस्सा बताया गया।
कम अवधि की कमजोरी के बावजूद कई संरचनात्मक कारण अभी भी सोने के पक्ष में माने जा रहे हैं।
उदाहरण के लिए, जे.पी. मॉर्गन का अनुमान है कि 2026 के अंत तक सोने की कीमत लगभग $5,000 प्रति औंस तक पहुंच सकती है, अगर निवेशकों और केंद्रीय बैंकों की मांग मजबूत बनी रहती है।
केंद्रीय बैंकों की खरीद विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में केंद्रीय बैंकों ने लगभग 244 टन सोना खरीदा, जिससे कुल वैश्विक मांग 1,231 टन तक पहुंच गई जिसकी कीमत रिकॉर्ड $193 अरब थी।
यह स्थिर रिज़र्व‑डाइवर्सिफिकेशन दीर्घकाल में कीमतों के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है, भले ही मैक्रो आर्थिक कारक अस्थायी गिरावट पैदा करें।
सोने का $4,500 के आसपास गिरना मुख्यतः भू‑राजनीति की वजह से नहीं बल्कि ब्याज दरों की गतिशीलता की वजह से हुआ।
अल्पकाल में बढ़ती महंगाई, ऊंची तेल कीमतें, मजबूत डॉलर और बढ़ती ट्रेजरी यील्ड्स ने निवेशकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि फेडरल रिज़र्व अधिक सख्त रुख अपना सकता है। इससे सोना रखने की लागत बढ़ गई और निवेशक भावना कमजोर हो गई।
लेकिन लंबी अवधि में केंद्रीय बैंकों की खरीद, वैश्विक अनिश्चितता और भविष्य में संभावित मौद्रिक ढील—ये सभी कारक सोने के लिए सकारात्मक बने रह सकते हैं।
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