उसी समय वैश्विक बॉन्ड बाजार में भी भारी बिकवाली देखने को मिली। ऊर्जा कीमतों में उछाल से निवेशकों को डर था कि महंगाई लंबे समय तक ऊंची रह सकती है और केंद्रीय बैंक ब्याज दरें ऊंची रख सकते हैं।
इसका नतीजा यह हुआ कि सरकारी बॉन्ड की कीमतें गिरीं और उनकी यील्ड तेजी से बढ़ गईं। अमेरिकी 10‑साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड करीब 4.63% तक पहुंच गई, जो कई महीनों के उच्च स्तरों में से एक थी।
अमेरिकी यील्ड बढ़ने से दो बड़े प्रभाव पड़ते हैं:
इस पूंजी के पलायन से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं—जैसे इंडोनेशियाई रुपिया—पर सीधा दबाव पड़ता है।
इन वैश्विक कारकों ने एक साथ काम किया:
परिणामस्वरूप रुपिया तेजी से गिरा और 17,500 प्रति डॉलर से नीचे चला गया। बाद में यह 17,700 से भी नीचे फिसल गया—जो इसका अब तक का सबसे कमजोर स्तर था।
मुद्रा की इस कमजोरी के बीच बाजार में यह भी चर्चा तेज हो गई कि Bank Indonesia (देश का केंद्रीय बैंक) विनिमय दर को स्थिर रखने के लिए ब्याज दर बढ़ा सकता है या विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।
रुपिया की गिरावट कोई अलग घटना नहीं थी। तेल की बढ़ती कीमतें और मजबूत डॉलर पूरे एशिया में असर दिखा रहे थे।
उदाहरण के लिए:
क्योंकि ये देश भी बड़े तेल आयातक हैं, इसलिए तेल की कीमतों में उछाल और डॉलर की मजबूती ने उनकी मुद्राओं को कमजोर कर दिया।
यह मुद्रा संकट वैश्विक बॉन्ड बाजार की बड़ी गिरावट के साथ भी जुड़ा था। निवेशक बढ़ती महंगाई और संभावित ब्याज दर वृद्धि की आशंका के कारण सरकारी बॉन्ड बेच रहे थे।
न्यूयॉर्क से टोक्यो तक कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बॉन्ड बाजारों में कीमतें गिरीं और यील्ड बढ़ीं—जिसे विश्लेषकों ने एक सिंक्रोनाइज़्ड ग्लोबल बॉन्ड सेल‑ऑफ बताया।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह स्थिति और कठिन होती है क्योंकि वे अक्सर विदेशी निवेश पर निर्भर रहती हैं। जब वैश्विक यील्ड बढ़ती है तो निवेशक जोखिम वाले बाजारों से तेजी से पैसा निकाल लेते हैं।
जो निवेशक जोखिम से बचना चाहते थे, उन्होंने सुरक्षित संपत्तियों—जैसे अमेरिकी डॉलर—की ओर रुख किया। इसका असर शेयर बाजारों पर भी पड़ा।
दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) इंडेक्स भी कई चरणों में तेज उतार‑चढ़ाव का शिकार हुआ। तेल की कीमतों में उछाल और शिपिंग मार्गों में संभावित बाधा के डर से परिवहन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के शेयरों पर दबाव बढ़ गया। कुछ मौकों पर कोस्पी में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
पूरी घटना को अगर क्रम में देखें तो यह एक सामान्य वैश्विक वित्तीय प्रतिक्रिया जैसी दिखती है:
इंडोनेशिया जैसे देशों के लिए—जो तेल आयात पर निर्भर हैं और विदेशी निवेश पर भी काफी हद तक टिके हैं—ऐसे वैश्विक झटके तेजी से मुद्रा गिरावट और बाजार अस्थिरता पैदा कर सकते हैं।
आमतौर पर जब तेल की कीमतें और बॉन्ड यील्ड स्थिर हो जाती हैं तो बाजार भी धीरे‑धीरे शांत हो जाते हैं। लेकिन यह घटना दिखाती है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में उभरते बाजार कितने गहराई से तेल कीमतों, अमेरिकी ब्याज दरों और भू‑राजनीतिक जोखिम से जुड़े हुए हैं।
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