यह पारंपरिक इनक्यूबेटर से अलग है। सामान्य इनक्यूबेटर केवल तापमान और नमी नियंत्रित करते हैं, लेकिन अंडे का प्राकृतिक खोल फिर भी मौजूद रहता है। यहां पूरा खोल ही इंजीनियरिंग से तैयार संरचना से बदल दिया गया।
कृत्रिम अंडे जैसी तकनीक पर शोध पहले भी हुआ है। कई प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने अंडे के खोल का कुछ हिस्सा हटाकर या पारदर्शी कंटेनर बनाकर भ्रूण का अवलोकन किया था।
लेकिन उन प्रणालियों में आम तौर पर भ्रूण को पूरी तरह विकसित कराना मुश्किल था। वे अक्सर केवल शुरुआती विकास या प्रयोगात्मक अध्ययन तक सीमित रहते थे।
Colossal का दावा है कि उसका सिस्टम प्रारंभिक भ्रूण से लेकर पूरी तरह चूजे के निकलने तक विकास को संभाल सकता है। यदि यह तकनीक विश्वसनीय साबित होती है तो यह पक्षी विकास (avian development) के अध्ययन और जीन संपादन प्रयोगों के लिए एक नया मंच बन सकती है।
फिर भी कुछ स्वतंत्र वैज्ञानिकों का कहना है कि सिस्टम के कुछ पहलू अभी भी प्राकृतिक अंडे की जैविक प्रक्रियाओं पर निर्भर हो सकते हैं।
Colossal Biosciences का बड़ा लक्ष्य केवल मुर्गियां नहीं है। कंपनी लंबे समय से विलुप्त प्रजातियों को वापस लाने की परियोजनाओं पर काम कर रही है—जैसे ऊनी मैमथ, डोडो और न्यूज़ीलैंड का विशाल पक्षी साउथ आइलैंड जायंट मोआ।
मोआ एक विशाल उड़ान‑रहित पक्षी था जो लगभग 600 साल पहले विलुप्त हो गया। इसकी मादाएं बहुत बड़ी होती थीं—कुछ का वजन 250 किलोग्राम तक बताया जाता है।
यहां एक बड़ी जैविक समस्या आती है:
यहीं कृत्रिम अंडा काम आ सकता है। यदि वैज्ञानिक अंडे के आकार और परिस्थितियों को कृत्रिम रूप से नियंत्रित कर सकें, तो सिद्धांततः वे ऐसे पक्षियों के भ्रूण भी विकसित कर सकते हैं जिनके लिए प्राकृतिक ‘सरोगेट’ उपलब्ध नहीं है।
कंपनी का कहना है कि भविष्य में इस सिस्टम को बड़ा बनाकर जीन‑संपादित पक्षियों के भ्रूण को विकसित किया जा सकता है जो विलुप्त प्रजातियों के करीब हों।
हालांकि यह प्रयोग तकनीकी रूप से दिलचस्प है, लेकिन कई वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि इसे डी‑एक्सटिंक्शन का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार असली चुनौतियां अभी बाकी हैं, जैसे:
कुछ वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि यदि यह सब संभव हो भी जाए, तो परिणाम संभवतः मूल विलुप्त प्रजाति नहीं बल्कि उसका जीन‑संपादित संस्करण होगा।
तकनीकी चुनौतियों के अलावा व्यापक सवाल भी उठते हैं। आज के पारिस्थितिकी तंत्र उन वातावरणों से काफी अलग हैं जिनमें कई विलुप्त जानवर रहते थे। ऐसे में पुनर्जीवित प्रजातियों को प्रकृति में छोड़ना अप्रत्याशित परिणाम दे सकता है।
कुछ संरक्षण विशेषज्ञ यह भी तर्क देते हैं कि डी‑एक्सटिंक्शन पर खर्च होने वाले संसाधन मौजूदा संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने में अधिक उपयोगी हो सकते हैं।
3D‑प्रिंटेड कृत्रिम अंडे से चूजों का सफलतापूर्वक निकलना निश्चित रूप से एक दिलचस्प तकनीकी उपलब्धि है। यदि इसे बड़े पैमाने पर दोहराया जा सके, तो यह पक्षी जीवविज्ञान और जीन इंजीनियरिंग के लिए नया शोध उपकरण बन सकता है।
लेकिन विलुप्त प्रजातियों—जैसे विशाल मोआ—को वास्तव में वापस लाने की राह अभी लंबी है। फिलहाल यह तकनीक उस जटिल वैज्ञानिक पहेली का सिर्फ शुरुआती टुकड़ा मानी जा रही है।
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