जनवरी जून 2026 में चीन ने अनुमानित 360 TWh पवन और सौर बिजली को सीमित कर दिया—यह मात्रा एक साल पहले से 49% अधिक और उस अवधि में बिजली मांग की पूरी बढ़ोतरी के बराबर थी। इसी दौरान कोयला बिजली उत्पादन करीब 3% बढ़ा, 30 GW नई कोयला क्षमता शुरू हुई और केवल 2.7 GW क्षमता बंद की गई। दूरदराज के नवीकरणीय क्षेत्रों से तटीय मांग...
शोध उत्तर

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: How did China’s renewable-energy curtailment in the first half of 2026 reach 360 TWh—49% more than a year earlier and enough to power the Un. Article summary: China’s estimated wind-and-solar curtailment reached 360 TWh in January–June 2026, 49% above a year earlier—an amount roughly sufficient to supply Mexico for a year. It was not simply a shortage of renewable capacity: ge. Topic tags: general, news, general web, user generated. Style: premium digital editorial illustration, source-backed research mood, clean composition, high detail, modern web publication hero. Use reference image context only for broad subject, composition, and topical grounding; do not copy the exact image. Avoid: logos, brand marks, copyrighted characters, real person likenesses, fake screenshots, UI text, readable text, watermarks, charts w
चीन की नवीकरणीय ऊर्जा कहानी में एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। देश ने पवन और सौर ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ाई, लेकिन जनवरी से जून 2026 के बीच अनुमानित 360 टेरावाट-घंटे (TWh) बिजली ग्रिड में शामिल नहीं की जा सकी। यह मात्रा एक साल पहले की तुलना में 49% अधिक थी और इतनी बिजली थी कि वह इसी अवधि में चीन की बिजली मांग की पूरी अतिरिक्त वृद्धि को पूरा कर सकती थी—और कोयला उत्पादन घट सकता था।
फिर भी उसी अवधि में कोयला-आधारित बिजली उत्पादन लगभग 3% बढ़ा। चीन ने 30 गीगावाट (GW) नई कोयला क्षमता चालू की, जबकि केवल 2.7 GW क्षमता बंद हुई। यह किसी तत्काल बिजली-कमी की सीधी कहानी नहीं है। इसके बजाय, यह दिखाता है कि चीन का ग्रिड, ट्रांसमिशन नेटवर्क, ऊर्जा भंडारण, बिजली बाजार और डिस्पैच नियम नवीकरणीय क्षमता बढ़ने की रफ्तार के साथ नहीं बदल पाए।
कर्टेलमेंट का अर्थ है कि ग्रिड ऑपरेटर ऐसी बिजली का उत्पादन सीमित कर देता है जिसे पवन टर्बाइन या सौर संयंत्र सामान्य परिस्थितियों में पैदा कर सकते थे। इसका मतलब यह नहीं कि पैनल या टर्बाइन खराब थे। आम तौर पर समस्या यह होती है कि उस समय बिजली को सुरक्षित रूप से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने या ग्रिड में समाहित करने का रास्ता उपलब्ध नहीं होता।
360 TWh का आंकड़ा Centre for Research on Energy and Clean Air (CREA) और Global Energy Monitor (GEM) के अनुमान पर आधारित है। इसमें आधिकारिक रूप से दर्ज और अनुमानित, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में शामिल न की गई कर्टेलमेंट दोनों शामिल हैं। इसलिए इसकी तुलना हर सरकारी राष्ट्रीय आंकड़े से सीधे नहीं की जा सकती। फिर भी कई रिपोर्टें एक ही रुझारा दिखाती हैं: स्वच्छ बिजली को रोका गया, जबकि कोयला उत्पादन बढ़ा।
चीन की नई पवन और सौर परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा उत्तर और पश्चिम के उन इलाकों में है जहां हवा और धूप प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके विपरीत, बिजली की सबसे बड़ी मांग पूर्वी और दक्षिणी तटीय प्रांतों में केंद्रित है।
इन दोनों क्षेत्रों के बीच बिजली पहुंचाने के लिए पर्याप्त स्थानीय ग्रिड क्षमता, लंबी दूरी के ट्रांसमिशन और प्रांतों के बीच बिजली व्यापार की जरूरत होती है। यदि कोई ट्रांसमिशन लाइन या बिजली प्राप्त करने वाला ग्रिड अपनी सीमा पर पहुंच जाए, तो अतिरिक्त नवीकरणीय बिजली को देश के किसी दूसरे हिस्से में तुरंत भेजना संभव नहीं होता। नतीजा यह होता है कि स्थानीय स्तर पर बिजली की जरूरत होने के बावजूद उत्पादन रोकना पड़ता है।
सौर बिजली आम तौर पर दिन में, खासकर दोपहर के आसपास, सबसे अधिक पैदा होती है। लेकिन मांग शाम के समय बढ़ सकती है। हवा की गति भी लगातार समान नहीं रहती और कई बार उस समय तेज होती है जब स्थानीय मांग कमजोर होती है।
पर्याप्त बैटरी, पंप्ड-हाइड्रो स्टोरेज, लचीली औद्योगिक मांग या अन्य नियंत्रित बिजली स्रोत उपलब्ध न हों तो ऑपरेटरों के पास सीमित विकल्प बचते हैं। ऐसे में बिजली सही जगह पर होने के बावजूद गलत समय पर उपलब्ध हो सकती है।
इसलिए केवल नई उत्पादन क्षमता जोड़ने से जीवाश्म ईंधन अपने-आप कम नहीं होता। ग्रिड को बिजली को संतुलित करने, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाने और उत्पादन के समय उसका उचित मूल्य तय करने में सक्षम होना पड़ता है।
चीन के कुछ बड़े नवीकरणीय ऊर्जा केंद्र अब भी कोयले को स्थिरता देने वाले स्रोत के रूप में शामिल करते हैं। उदाहरण के लिए, इनर मंगोलिया के कुबुकी क्षेत्र से शंघाई तक प्रस्तावित अल्ट्रा-हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (UHVDC) परियोजना में 60% से अधिक बिजली नवीकरणीय स्रोतों से आने की योजना है। इसमें 9,000 मेगावाट-घंटे स्टोरेज और 2.64 GW कोयला क्षमता भी शामिल है।
यह चीन के सामने मौजूद नीतिगत विकल्प को स्पष्ट करता है: क्या अस्थिर पवन-सौर उत्पादन को बैटरी और अन्य लचीले स्रोतों से सहारा दिया जाए, या नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों के साथ कोयले को जोड़े रखा जाए?
CREA और GEM के अनुसार, 2026 में कोयला बिजली उत्पादकों से अब भी यह अपेक्षा थी कि वे पिछले वर्ष वितरित की गई बिजली का लगभग 60–70% कवर करने वाले वार्षिक अनुबंध करें। ऐसे अनुबंध आपूर्ति सुरक्षा और संयंत्रों के राजस्व को स्थिर कर सकते हैं, लेकिन वे सीमित बिजली मांग का बड़ा हिस्सा पहले ही कोयले के लिए आरक्षित भी कर देते हैं।
इससे कोयला केवल आपातकालीन बैकअप नहीं रह जाता। जब कोयला संयंत्रों के पास बिजली पैदा करने का आर्थिक प्रोत्साहन या संविदात्मक दायित्व हो, तब कम सीमांत लागत वाली पवन और सौर बिजली को भी रोका जा सकता है।
2026 की पहली छमाही में 30 GW नई कोयला क्षमता जोड़ना केवल आपातकाल के लिए रखे गए रिजर्व बेड़े का विस्तार नहीं था। 2.7 GW ही बंद होने से चीन के पास बिजली बिक्री के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे कोयला संयंत्रों का कुल बेड़ा और बड़ा हो गया।
CREA के अनुसार, कोयला संयंत्रों का उपयोग कम तीव्रता से हो रहा था, फिर भी कुल कोयला उत्पादन बढ़ा। यह स्थिति आम तौर पर इस ओर इशारा करती है कि सीमित मांग के लिए अधिक क्षमता प्रतिस्पर्धा कर रही है।
नई क्षमता ने ऑपरेटरों पर दबाव बढ़ाया:
इसी वजह से नई कोयला परियोजनाओं पर कड़े नियंत्रण के संकेत तुरंत उत्पादन घटाने में बदल नहीं पाए। पहले से मंजूर या निर्माणाधीन परियोजनाएं चलती रहीं। उपलब्ध साक्ष्य इस समस्या को देशव्यापी बिजली-कमी से अधिक संरचनात्मक लॉक-इन और ओवरसप्लाई के रूप में दिखाते हैं।
संकेत पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं हैं। चीनी ऊर्जा रिपोर्टिंग के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में नवीकरणीय स्रोतों ने चीन की 40% से अधिक बिजली दी, जबकि कोयला बिजली की हिस्सेदारी पहली बार 50% से नीचे गई। लेकिन हिस्सेदारी घटने का यह अर्थ नहीं कि कोयला उत्पादन भी अनिवार्य रूप से घटेगा। कुल बिजली उत्पादन और कुल उत्पादन क्षमता दोनों एक साथ बढ़ सकते हैं।
कर्टेलमेंट किसी परियोजना की अर्थव्यवस्था को सीधे कमजोर करता है। डेवलपर जिस बिजली उत्पादन और राजस्व की उम्मीद पर संयंत्र बनाता है, ग्रिड जाम या डिस्पैच सीमा के कारण वह बिजली बिक ही न पाए। इससे ग्रिड कनेक्शन, भविष्य की कीमत और आय को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है।
चीन में 2026 की पहली छमाही में नए सौर संयंत्रों की स्थापना सालाना आधार पर 66% घटकर 72.07 GW रह गई, जबकि एक साल पहले यह 212.21 GW थी। रिपोर्टों ने इस गिरावट को मूल्य सुधार लागू होने से पहले परियोजनाओं को जल्दबाजी में ग्रिड से जोड़ने की होड़ के खत्म होने से जोड़ा है। इसलिए यह आंकड़ा अकेले यह साबित नहीं करता कि गिरावट कर्टेलमेंट के कारण हुई। फिर भी कम पूर्वानुमेय बाजार डेवलपरों को अधिक चयनात्मक बना सकता है।
संभावित व्यावसायिक प्रतिक्रिया ऐसी परियोजनाओं की ओर झुकाव हो सकती है जो केवल बिजली पैदा न करें, बल्कि अधिक भरोसेमंद आपूर्ति भी दें:
सौर पैनल बिक्री की वृद्धि धीमी पड़ने के बीच चीनी सौर निर्माता बैटरी निर्यात का विस्तार कर रहे हैं। यह बदलाव स्टोरेज उत्पादों की बढ़ती मांग के अनुरूप है। हालांकि स्टोरेज ग्रिड सुधार का पूरा विकल्प नहीं है, लेकिन इससे नवीकरणीय परियोजनाओं का व्यावसायिक मूल्य बढ़ सकता है।
एशिया के कई देशों में मूल समस्या समान है: नवीकरणीय क्षमता का विस्तार ट्रांसमिशन, ऊर्जा भंडारण और बाजार सुधार से तेज हो गया है। हालांकि समस्या का पैमाना और संस्थागत कारण अलग-अलग हैं।
ऑस्ट्रेलिया में रूफटॉप और बड़े सौर संयंत्रों के तेज विस्तार से दिन के समय बिजली की अतिरिक्त आपूर्ति पैदा हुई है। ट्रांसमिशन बाधाओं और बैटरी तैनाती के अपेक्षाकृत धीमे विस्तार ने इस समस्या को बढ़ाया। Reuters द्वारा उद्धृत OpenElectricity आंकड़ों के अनुसार, 2025 के पहले नौ महीनों में पवन-सौर कर्टेलमेंट तीन गुने से अधिक बढ़कर 3.7 TWh हो गया, जो उस अवधि के कुल नवीकरणीय उत्पादन का 6.8% था।
ऑस्ट्रेलिया की चुनौती मुख्यतः स्थानीय नेटवर्क जाम, दोपहर की ओवरसप्लाई और सिस्टम में लचीलेपन की कमी है। यह चीन जैसी स्थिति नहीं है, जहां कोयला संयंत्रों के अनुबंध बड़े पैमाने पर मांग सुरक्षित करते हैं। ऑस्ट्रेलिया व्यावसायिक रूफटॉप सौर और बैटरी परियोजनाओं के लिए समर्थन भी बढ़ा रहा है।
जापान का बिजली तंत्र अलग-अलग क्षेत्रीय ग्रिड क्षेत्रों में बंटा हुआ है और इनके बीच ट्रांसफर क्षमता सीमित है। परमाणु बिजली उत्पादन बढ़ने से भी पवन-सौर बिजली के लिए उपलब्ध जगह कम हो सकती है, क्योंकि परमाणु संयंत्र कम-कार्बन बिजली की निरंतर आपूर्ति करते हैं।
Reuters की औद्योगिक आंकड़ों की समीक्षा के अनुसार, 2025 के पहले आठ महीनों में जापान के 10 में से 9 ग्रिड क्षेत्रों में नवीकरणीय कर्टेलमेंट 38.2% बढ़कर 1.77 TWh हो गया, जो कुल हरित बिजली उत्पादन का 2.3% था।
यह चीन की तुलना में अधिक क्षेत्रीय और कम मात्रा वाली समस्या है। उपलब्ध स्रोत 2026 की पहली छमाही के लिए जापान का तुलनीय राष्ट्रीय आंकड़ा नहीं देते, इसलिए मौजूदा वर्ष की सीधी तुलना सावधानी से की जानी चाहिए।
भारत में भी कर्टेलमेंट का संबंध ट्रांसमिशन बाधाओं और ग्रिड सुरक्षा की जरूरतों से है। सरकार के अनुसार, अप्रैल-जून 2026 के दौरान भारत में 8,133 गीगावाट-घंटे (GWh) सौर बिजली को रोका गया। मासिक आंकड़े अप्रैल में 2,417 GWh, मई में 3,235 GWh और जून में 2,481 GWh थे।
यह मात्रा महत्वपूर्ण है, लेकिन चीन के अनुमानित 360 TWh से काफी कम है। इसका एक कारण चीन का कहीं बड़ा नवीकरणीय बिजली बेड़ा भी है; इसलिए केवल कुल मात्रा से दोनों देशों की नीति-प्रदर्शन की सीधी तुलना नहीं की जा सकती। फिर भी दोनों उदाहरण दिखाते हैं कि बिजली उत्पादन क्षमता के साथ-साथ ट्रांसमिशन निवेश भी बढ़ना चाहिए।
चीन का अनुभव बताता है कि नवीकरणीय ऊर्जा की सफलता का आकलन केवल स्थापित GW से नहीं किया जा सकता। एक काम करने वाले स्वच्छ बिजली तंत्र के लिए जरूरी है:
चीन की केंद्रीय समस्या यह नहीं है कि उसने अलग-अलग बहुत अधिक नवीकरणीय क्षमता बना ली। समस्या यह है कि इस क्षमता को ऐसे बिजली तंत्र में जोड़ा गया है जिसमें कोयले की भौतिक और संस्थागत भूमिका अब भी सुरक्षित है। जब तक ट्रांसमिशन, बाजार और डिस्पैच की ये संरचनाएं नहीं बदलतीं, तब तक चीन में पवन-सौर क्षमता बढ़ने के साथ कोयला उत्पादन भी बढ़ सकता है—और स्वच्छ बिजली की बर्बादी भी।
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जनवरी जून 2026 में चीन ने अनुमानित 360 TWh पवन और सौर बिजली को सीमित कर दिया—यह मात्रा एक साल पहले से 49% अधिक और उस अवधि में बिजली मांग की पूरी बढ़ोतरी के बराबर थी।
जनवरी जून 2026 में चीन ने अनुमानित 360 TWh पवन और सौर बिजली को सीमित कर दिया—यह मात्रा एक साल पहले से 49% अधिक और उस अवधि में बिजली मांग की पूरी बढ़ोतरी के बराबर थी। इसी दौरान कोयला बिजली उत्पादन करीब 3% बढ़ा, 30 GW नई कोयला क्षमता शुरू हुई और केवल 2.7 GW क्षमता बंद की गई।
दूरदराज के नवीकरणीय क्षेत्रों से तटीय मांग केंद्रों तक बिजली पहुंचाने में ट्रांसमिशन बाधाएं, भंडारण की कमी और प्रांतीय बाजारों की सीमाएं बड़ी रुकावट बनीं।