परमाणु घड़ी की सटीकता सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह कितनी तेज़ आवृत्ति को मापती है। यह भी जानना पड़ता है कि ताप, विद्युत और चुंबकीय प्रभाव उस आवृत्ति को कितना बदल रहे हैं। सिंगापुर के सेंटर फॉर क्वांटम टेक्नोलॉजीज़ में मरे बैरेट की टीम ने इन्हीं बदलावों का हिसाब रखते हुए ल्यूटेशियम-आयन ऑप्टिकल घड़ी की आवृत्ति की सापेक्ष अनिश्चितता लगभग 1 × 10⁻¹⁹ बताई है। 23 सितंबर 2026 को नेचर में प्रकाशित परिणाम को टीम ऑप्टिकल परमाणु घड़ी के लिए अब तक दर्ज सबसे सटीक परिणाम बताती है।
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घड़ी की ‘टिक’ कहाँ से आती है?
इस घड़ी में ल्यूटेशियम-176 का एक आवेशित आयन है। 848 नैनोमीटर तरंगदैर्ध्य वाला लेज़र आयन के दो ऊर्जा स्तरों के बीच होने वाले बदलाव को परखता है; इसी बदलाव की आवृत्ति समय मापने का संदर्भ बनती है। लेकिन इतनी सूक्ष्म आवृत्ति भी अपने-आप सही समय की गारंटी नहीं देती: आसपास के विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र और तापीय विकिरण उसे बदल सकते हैं।
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टीम ने ऐसे बदलावों से निपटने के लिए हाइपरफाइन औसतन विकसित किया। इसमें आयन की एक ही आंतरिक अवस्था पर भरोसा करने के बजाय संबंधित अवस्थाओं में मापों को इस तरह मिलाया जाता है कि कुछ अवस्था-निर्भर बदलाव एक-दूसरे को काट दें। समूह की 2015 की शोध योजना में यह तरीका मौजूद था; बाद में उसने बहु-आयन ल्यूटेशियम घड़ी में इसे प्रयोग से प्रदर्शित किया।
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हर प्रभाव इस तरीके से नहीं मिटता। 2019 में टीम ने तीन आयनों वाली घड़ी में आयनों के बीच आवृत्ति-अंतर मापा और घटाया, जिसमें विद्युत क्वाड्रुपोल प्रभाव से जुड़े बदलाव भी शामिल थे। ल्यूटेशियम पर शोध तापीय विकिरण और विद्युत क्षेत्र में बदलाव से पैदा होने वाले प्रभावों की भी जाँच करता है। इसलिए उपलब्धि का मतलब यह नहीं कि यह आयन अपने वातावरण से पूरी तरह अप्रभावित है।
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1 × 10⁻¹⁹ और 5.7 × 10⁻¹⁹ में फर्क
लगभग 1 × 10⁻¹⁹ एक घड़ी के आवृत्ति-संदर्भ के लिए बताई गई सापेक्ष अनिश्चितता है। टीम ने स्वतंत्र रूप से बनी दो एकल-आयन घड़ियों की तुलना भी की; उस तुलना की अनिश्चितता 5.7 × 10⁻¹⁹ थी। दूसरा आँकड़ा यह जाँचता है कि घड़ियाँ आपस में कितनी मेल खाती हैं—वह पहली संख्या का दूसरा रूप नहीं है।
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समूह ने ल्यूटेशियम संदर्भों की तुलना में कोरिलेशन स्पेक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया है। यह तरीका तुलना पर लेज़र के शोर का असर घटाकर घड़ियों के बीच छोटा अंतर पकड़ने में मदद करता है। हालाँकि, यदि दोनों घड़ियों में एक-जैसा व्यवस्थित विचलन हो, तो केवल यह तुलना उसे खारिज नहीं कर सकती। मूल प्रश्न में 200 घंटे की तुलना का उल्लेख है, लेकिन उपलब्ध स्रोत-अंश उस अवधि और उसके पूरे अनिश्चितता-आकलन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करते।
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‘260 अरब वर्षों में एक सेकंड से कम’ का अंतर भी एक गणितीय उदाहरण है, इतने लंबे समय तक किया गया परीक्षण नहीं। यदि 1 × 10⁻¹⁹ की सापेक्ष त्रुटि लगातार बनी रहे, तो हिसाब लगभग 317 अरब वर्षों में एक सेकंड देता है; 1.2 × 10⁻¹⁹ पर यह लगभग 264 अरब वर्ष होगा। उदाहरण किस संख्या पर आधारित है, इससे उसका उत्तर बदलता है।
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आगे की चुनौती
इतनी सटीक ऑप्टिकल घड़ी भविष्य में ‘सेकंड’ की परिभाषा बदलने के प्रयासों में योगदान दे सकती है। फिर भी, एक प्रयोगशाला का परिणाम अकेले यह साबित नहीं करता कि दूसरी प्रयोगशालाएँ इसे दोहरा सकेंगी, न ही यह तय करता है कि मानक के लिए कौन-सा परमाणु संक्रमण चुना जाएगा। उपलब्ध साक्ष्य बदलाव की किसी औपचारिक समयसीमा की पुष्टि नहीं करते।
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इस स्तर पर घड़ी कहाँ रखी है, यह भी माप का हिस्सा बन जाता है: पृथ्वी की सतह के पास ऊँचाई में महज़ एक मिलीमीटर का अंतर गुरुत्वाकर्षण के कारण आवृत्ति में लगभग 1.1 × 10⁻¹⁹ का सापेक्ष बदलाव ला सकता है। अलग-अलग जगहों की घड़ियाँ मिलाने के लिए उनके बीच गुरुत्वीय विभव का अंतर जानना होगा। घड़ी को कहीं ले जाने योग्य बनाना अगली अलग चुनौती है—स्थान बदलने के बाद आयन, लेज़र और पर्यावरणीय प्रभावों पर नियंत्रण बनाए रखना तथा अनिश्चितता दोबारा साबित करना होगा।
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