कॉपर की कीमतों में उछाल का एक कम चर्चा वाला कारण है—सल्फ्यूरिक एसिड की उपलब्धता।
कम ग्रेड वाले कॉपर अयस्क को निकालने के लिए उद्योग में "सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन" और "इलेक्ट्रोविनिंग" जैसी तकनीकों का उपयोग होता है। इन प्रक्रियाओं के लिए बड़ी मात्रा में सल्फ्यूरिक एसिड की आवश्यकता होती है।
यदि शिपिंग बाधाओं के कारण सल्फर या सल्फ्यूरिक एसिड की सप्लाई प्रभावित होती है, तो कॉपर उत्पादन में बाधा आ सकती है।
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि हॉरमुज़ मार्ग से शिपिंग में व्यवधान लंबा खिंचता है, तो वैश्विक स्तर पर सल्फ्यूरिक एसिड की कमी हो सकती है—जो सीधे कॉपर उत्पादन को प्रभावित करेगी।
स्थिति और जटिल इसलिए भी हो सकती है क्योंकि चीन ने सल्फ्यूरिक एसिड निर्यात पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाए हैं, जिससे वैश्विक उपलब्धता और सीमित हो सकती है।
सरल शब्दों में कहें तो तेल टैंकरों से शुरू हुआ भू‑राजनीतिक संकट अंततः कॉपर रिफाइनिंग में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की कमी के माध्यम से इस धातु की सप्लाई को प्रभावित कर सकता है।
अल्पकालिक संकटों से अलग, कॉपर की कहानी का बड़ा हिस्सा दीर्घकालिक मांग से जुड़ा है।
कॉपर को अक्सर "इलेक्ट्रिफिकेशन की धातु" कहा जाता है। इसके मुख्य कारण हैं:
AI डेटा सेंटरों के विस्तार ने इस मांग को और बढ़ा दिया है, क्योंकि इन्हें भारी मात्रा में बिजली और उच्च क्षमता वाले पावर नेटवर्क की जरूरत होती है। इससे कॉपर वायरिंग और इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स की मांग बढ़ती है।
विश्लेषकों का कहना है कि कमोडिटी बाजार में जो व्यापक तेजी दिख रही है, वह केवल तेल संकट से नहीं बल्कि इस तकनीकी और ऊर्जा संक्रमण से भी जुड़ी है।
हाल ही में कॉपर फ्यूचर्स मई में बने लगभग $6.65 प्रति पाउंड के रिकॉर्ड स्तर से थोड़ा नीचे आए हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से अब भी काफी ऊंचे बने हुए हैं।
मध्य पूर्व में भू‑राजनीतिक अनिश्चितता और ऊर्जा लागत में उतार‑चढ़ाव के कारण उत्पादन लागत और सप्लाई अपेक्षाओं पर दबाव बना हुआ है।
इसी वजह से कॉपर वैश्विक बाजारों में सबसे ज्यादा निगरानी की जाने वाली औद्योगिक धातुओं में से एक बन गया है।
वैश्विक निवेश बैंक मानते हैं कि निकट भविष्य में कीमतों में उतार‑चढ़ाव बना रहेगा, लेकिन लंबी अवधि का ट्रेंड सप्लाई और मांग के संतुलन पर निर्भर करेगा।
गोल्डमैन सैक्स का अनुमान अपेक्षाकृत सतर्क है। बैंक के अनुसार 2026 में वैश्विक कॉपर बाजार में अधिशेष (surplus) हो सकता है और औसत कीमत लगभग $12,650 प्रति मीट्रिक टन रह सकती है।
हालांकि बैंक ने यह भी कहा है कि यदि हॉरमुज़ संकट या सल्फ्यूरिक एसिड सप्लाई बाधाएं जारी रहती हैं, तो अस्थायी कमी से कीमतें अपेक्षा से अधिक बढ़ सकती हैं।
दूसरी ओर UBS का दृष्टिकोण अधिक सकारात्मक है। बैंक ने अनुमान लगाया है कि लगातार सप्लाई बाधाओं और इलेक्ट्रिफिकेशन की तेज़ मांग के कारण कॉपर की कीमतें 2027 की शुरुआत तक लगभग $15,000 प्रति टन तक पहुंच सकती हैं।
यदि दोनों देशों के बीच स्थायी समझौता हो जाता है और हॉरमुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य शिपिंग बहाल हो जाती है, तो कुछ तत्काल दबाव कम हो सकते हैं:
लेकिन इससे कॉपर की दीर्घकालिक मांग खत्म नहीं होगी। बिजली नेटवर्क, क्लीन एनर्जी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश के कारण आने वाले वर्षों में कॉपर की खपत बढ़ने की संभावना बनी रहेगी।
कॉपर की तेजी किसी एक वजह से नहीं है। यह अल्पकालिक भू‑राजनीतिक झटकों और दीर्घकालिक औद्योगिक बदलावों का संयुक्त परिणाम है।
मध्य पूर्व में शिपिंग बाधाएं और सल्फ्यूरिक एसिड की संभावित कमी निकट अवधि में सप्लाई को सीमित कर सकती हैं। वहीं AI, इलेक्ट्रिफिकेशन और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश कॉपर की दीर्घकालिक मांग को लगातार ऊपर धकेल रहा है।
इसलिए भले ही क्षेत्रीय तनाव कम हो जाए, कई विश्लेषकों के अनुसार कॉपर आने वाले दशक की सबसे रणनीतिक—और संभावित रूप से सबसे अस्थिर—कमोडिटी में से एक बना रह सकता है।
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