हालाँकि इस हमले से परमाणु सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ा और किसी के घायल होने की खबर नहीं है, लेकिन इस घटना ने यह संकेत दिया कि क्षेत्र की अहम ऊर्जा अवसंरचना भी संभावित लक्ष्य बन सकती है। यही धारणा तेल बाजार में भू‑राजनीतिक जोखिम प्रीमियम बढ़ाने के लिए काफी होती है।
खाड़ी क्षेत्र वैश्विक तेल उत्पादन और निर्यात का बड़ा केंद्र है, इसलिए यहाँ किसी भी अस्थिरता का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है।
स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। अनुमान है कि वैश्विक तेल और एलएनजी का लगभग पाँचवाँ हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए यदि इस मार्ग में बाधा आती है तो वैश्विक आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने इस आशंका को बढ़ा दिया है कि जहाज़रानी बाधित हो सकती है। बाजारों को भले ही पूर्ण अवरोध की संभावना कम लगे, लेकिन यदि ऐसा जोखिम भी दिखाई देता है तो व्यापारी संभावित कमी से बचने के लिए कीमतों में तेजी को शामिल कर लेते हैं।
इतिहास बताता है कि हॉरमुज़ से जुड़ी किसी भी भू‑राजनीतिक घटना के बाद तेल की कीमतों में अचानक उछाल आ सकता है, क्योंकि वैकल्पिक मार्ग सीमित हैं और वैश्विक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता भी सीमित होती है।
बराकाह परमाणु संयंत्र के पास हुआ ड्रोन हमला इस चिंता को और बढ़ाता है कि संघर्ष केवल समुद्री मार्गों तक सीमित नहीं रह सकता। अधिकारियों के अनुसार ड्रोन हमले से संयंत्र की बाहरी सीमा के पास एक विद्युत जनरेटर में आग लगी, लेकिन रेडियोलॉजिकल सुरक्षा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
बाजारों के लिए असली मुद्दा तत्काल नुकसान नहीं बल्कि एक खतरनाक मिसाल है। यदि बिजली संयंत्र, बंदरगाह, तेल टर्मिनल या पाइपलाइन जैसे ढाँचे निशाने पर आने लगते हैं, तो ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का जोखिम बढ़ जाता है—और यही जोखिम तेल की कीमतों में अतिरिक्त प्रीमियम जोड़ देता है।
बाजारों की चिंता केवल सैन्य घटनाओं से नहीं बढ़ रही, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी प्रगति की कमी दिख रही है।
निवेशकों को उम्मीद थी कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक से तनाव कम करने का कोई रास्ता निकल सकता है। लेकिन बैठक से कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई, जिससे यह धारणा मजबूत हुई कि मौजूदा संकट को जल्दी सुलझाना मुश्किल हो सकता है।
इसी बीच वाशिंगटन की ओर से यह चेतावनी भी दी गई कि ईरान के साथ समझौते के लिए “समय तेजी से निकल रहा है”, जिससे स्थिति और बिगड़ने की आशंका बढ़ी।
बाजारों के लिए इसका मतलब है कि तेल की कीमतों में शामिल जोखिम प्रीमियम जल्द कम होने की संभावना फिलहाल कम है।
तेल की कीमतों का सीधा असर महंगाई की उम्मीदों पर पड़ता है। जब ऊर्जा महंगी होती है तो ईंधन, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ती है—और इससे पूरी अर्थव्यवस्था में कीमतें ऊपर जा सकती हैं।
यही कारण है कि दुनिया भर में सरकारी बॉन्ड की कीमतें गिर रही हैं और उनकी यील्ड बढ़ रही है, क्योंकि निवेशक ऊँची महंगाई के जोखिम की भरपाई के लिए ज्यादा रिटर्न चाहते हैं।
हालिया बाजार गतिविधि में यह साफ दिखा:
बॉन्ड की कीमत और यील्ड उल्टी दिशा में चलती हैं, इसलिए यील्ड बढ़ने का मतलब है कि सरकारों, कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है।
तेल की कीमतों में तेजी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों के लिए नीति बनाना मुश्किल कर देती है।
ऊर्जा कीमतों का उछाल महंगाई को कम होने की गति धीमी कर सकता है। इससे अमेरिकी फेडरल रिज़र्व ब्याज दरों में कटौती करने को लेकर ज्यादा सतर्क हो सकता है। बाजार पहले जितनी तेजी से दरों में कटौती की उम्मीद कर रहे थे, अब उस पर पुनर्विचार हो रहा है।
ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था ऊर्जा कीमतों के प्रति काफी संवेदनशील है। यदि तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, तो महंगाई बढ़ सकती है और बैंक ऑफ इंग्लैंड के लिए दरों में ढील देना मुश्किल हो सकता है।
जापान के लिए स्थिति अलग है। आयातित ऊर्जा की कीमतें पहले ही उत्पादक कीमतों को ऊपर धकेल रही हैं। इससे यह संभावना मजबूत होती है कि बैंक ऑफ जापान कई वर्षों की बेहद ढीली मौद्रिक नीति के बाद धीरे‑धीरे सख्ती जारी रख सकता है।
इन सभी घटनाओं को मिलाकर देखें तो निवेशकों की सोच बदलती दिखाई दे रही है।
साल की शुरुआत में कई ट्रेडरों को उम्मीद थी कि आर्थिक वृद्धि धीमी होने से केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती करेंगे। लेकिन तेल की कीमतों में तेजी ने उस धारणा को चुनौती दी है।
अब बाजार उस स्थिति की तैयारी कर रहे हैं जिसमें ऊर्जा‑आधारित आपूर्ति झटकों के कारण महंगाई ऊँची बनी रहती है, भले ही आर्थिक वृद्धि कमजोर क्यों न हो। यही वजह है कि $110 के करीब पहुँचा तेल सिर्फ ऊर्जा बाजार की खबर नहीं है—यह पूरे वैश्विक वित्तीय सिस्टम की दिशा बदल सकता है।
Comments
0 comments