रिपोर्टों के अनुसार चर्चा एक प्रारंभिक ढाँचे या समझौता ज्ञापन (MoU) पर केंद्रित है। इसमें तुरंत संघर्ष विराम और कुछ हफ्तों की समय सीमा में व्यापक समझौते पर बातचीत जैसे प्रस्ताव शामिल हो सकते हैं।
इससे पहले भी 2025 में ओमान की राजधानी मस्कट और बाद में रोम में अमेरिका‑ईरान के बीच परमाणु वार्ताएँ हुई थीं, जिनमें प्रतिनिधिमंडल अक्सर अलग कमरों में बैठते थे और मध्यस्थ संदेश पहुंचाते थे।
हालाँकि कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक निर्णायक प्रगति नहीं हुई है।
वार्ताओं का सबसे कठिन मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगी चाहते हैं कि ईरान यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) पर सख्त सीमाएँ स्वीकार करे और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की व्यवस्था बने ताकि परमाणु हथियार बनने का जोखिम न रहे।
दूसरी ओर ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों के लिए है, इसलिए वह संवर्धन पूरी तरह बंद करने की मांग को स्वीकार नहीं करता। इसी मतभेद के कारण कई दौर की बातचीत अटक चुकी है।
ग़ल्फ देशों के अधिकारी यह भी कहते हैं कि अगर किसी समझौते में ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम पर नियंत्रण नहीं हुआ तो भविष्य में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
सुरक्षा मुद्दों के साथ‑साथ आर्थिक पहलू भी बातचीत का अहम हिस्सा हैं।
ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने और विदेशों में जमे हुए अपने अरबों डॉलर के फंड तक पहुंच की मांग कर रहा है। तेहरान का तर्क है कि आर्थिक राहत के बिना किसी भी परमाणु समझौते को घरेलू राजनीति में स्वीकार करना मुश्किल होगा।
कुछ प्रस्तावों में भरोसा बढ़ाने के कदम के तौर पर जमे हुए ईरानी फंड का आंशिक रिलीज़ भी शामिल बताया गया है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी विवादित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है।
मध्य‑पूर्व की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)—ईरान और ओमान के बीच स्थित संकरा समुद्री मार्ग, जिससे होकर दुनिया के बड़े हिस्से का तेल निर्यात गुजरता है।
यूएई के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गर्गाश ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान इस मार्ग को नियंत्रित या राजनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करता है तो यह बेहद खतरनाक मिसाल होगी। इसलिए किसी भी समझौते में इस जलमार्ग से स्वतंत्र और सुरक्षित आवाजाही की गारंटी होना जरूरी है।
अगर इस मार्ग में व्यवधान होता है तो वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल और व्यापक आर्थिक झटका लग सकता है।
ग़ल्फ देशों के कई अधिकारी मानते हैं कि युद्ध का एक और दौर पूरे मध्य‑पूर्व को अस्थिर कर सकता है। गर्गाश ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौते की संभावना फिलहाल लगभग “50‑50” है।
उनका तर्क है कि सिर्फ अस्थायी युद्धविराम काफी नहीं होगा—समझौते में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, मिसाइल क्षमता और समुद्री सुरक्षा जैसे मूल विवादों को भी हल करना होगा, वरना संघर्ष फिर भड़क सकता है।
फिलहाल ग़ल्फ देशों की रणनीति साफ है: सैन्य टकराव को टालना, बातचीत को जारी रखना और ऐसा समझौता करवाना जो सुरक्षा और आर्थिक दोनों चिंताओं को संबोधित करे।
लेकिन अंतिम समाधान इस बात पर निर्भर करेगा कि वॉशिंगटन और तेहरान अपने मुख्य हितों के बीच संतुलन बना पाते हैं या नहीं—एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी परमाणु कार्यक्रम पर कड़े नियंत्रण चाहते हैं, जबकि दूसरी तरफ ईरान प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक पहुंच की मांग कर रहा है।
जब तक इन मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तब तक मध्य‑पूर्व के इस बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र में तनाव और अनिश्चितता बनी रहने की संभावना है।
Comments
0 comments