यूएई, सऊदी अरब और क़तर के नेताओं ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से ईरान पर प्रस्तावित अमेरिकी हमले टालने को कहा ताकि चल रही कूटनीतिक वार्ताओं को मौका मिल सके। [37][34] अमेरिका‑ईरान बातचीत का केंद्र ईरान का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत, विदेशों में जमे ईरानी फंड और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा जैसे म...

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: How are the United Arab Emirates, Saudi Arabia, and Qatar trying to persuade President Trump to delay military strikes on Iran, what diploma. Article summary: The Gulf monarchies are trying to buy time for diplomacy by telling Trump that active negotiations with Tehran could still produce a deal, so a strike now could wreck a possible settlement. Current reporting says the UAE. Topic tags: general, general web, user generated. Reference image context from search candidates: Reference image 1: visual subject "WTAE - Pittsburgh Action News 4. # Trump postpones planned attack on Iran amid Gulf allies' requests. ## President Trump has delayed a planned U.S. attack on Iran, citing requests" source context "Trump delays attack on Iran amid Gulf allies' requests" Reference image 2: visual subject "US leader said he “held of
मध्य‑पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने क्षेत्रीय राजनीति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। ऐसे माहौल में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब और क़तर जैसे ग़ल्फ देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले टालने का आग्रह किया। उनका तर्क है कि अगर कूटनीतिक बातचीत को समय दिया जाए तो शायद संघर्ष के बजाय राजनीतिक समाधान निकल सकता है।
मई 2026 में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने ईरान पर तय अमेरिकी हमले को रोक दिया क्योंकि क़तर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद ने उनसे ऐसा करने का आग्रह किया था। उनका कहना था कि तेहरान के साथ “गंभीर बातचीत” चल रही है और उसे समय मिलना चाहिए।
ग़ल्फ देशों के लिए यह केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि आर्थिक और सुरक्षा से भी जुड़ा है। ईरान के साथ युद्ध भड़कने से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल सकती है और तेल तथा समुद्री व्यापार के रास्ते बाधित हो सकते हैं—जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ये देश चाहते हैं कि सैन्य कार्रवाई से पहले बातचीत के सभी विकल्प आज़माए जाएँ।
वर्तमान में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सीधे नहीं बल्कि मध्यस्थों के ज़रिये हो रही है। पाकिस्तान इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रहा है और वॉशिंगटन तथा तेहरान के बीच संदेश और प्रस्ताव पहुंचाने का काम कर रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार चर्चा एक प्रारंभिक ढाँचे या समझौता ज्ञापन (MoU) पर केंद्रित है। इसमें तुरंत संघर्ष विराम और कुछ हफ्तों की समय सीमा में व्यापक समझौते पर बातचीत जैसे प्रस्ताव शामिल हो सकते हैं।
इससे पहले भी 2025 में ओमान की राजधानी मस्कट और बाद में रोम में अमेरिका‑ईरान के बीच परमाणु वार्ताएँ हुई थीं, जिनमें प्रतिनिधिमंडल अक्सर अलग कमरों में बैठते थे और मध्यस्थ संदेश पहुंचाते थे।
हालाँकि कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक निर्णायक प्रगति नहीं हुई है।
वार्ताओं का सबसे कठिन मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगी चाहते हैं कि ईरान यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) पर सख्त सीमाएँ स्वीकार करे और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की व्यवस्था बने ताकि परमाणु हथियार बनने का जोखिम न रहे।
दूसरी ओर ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों के लिए है, इसलिए वह संवर्धन पूरी तरह बंद करने की मांग को स्वीकार नहीं करता। इसी मतभेद के कारण कई दौर की बातचीत अटक चुकी है।
ग़ल्फ देशों के अधिकारी यह भी कहते हैं कि अगर किसी समझौते में ईरान के मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम पर नियंत्रण नहीं हुआ तो भविष्य में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
सुरक्षा मुद्दों के साथ‑साथ आर्थिक पहलू भी बातचीत का अहम हिस्सा हैं।
ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने और विदेशों में जमे हुए अपने अरबों डॉलर के फंड तक पहुंच की मांग कर रहा है। तेहरान का तर्क है कि आर्थिक राहत के बिना किसी भी परमाणु समझौते को घरेलू राजनीति में स्वीकार करना मुश्किल होगा।
कुछ प्रस्तावों में भरोसा बढ़ाने के कदम के तौर पर जमे हुए ईरानी फंड का आंशिक रिलीज़ भी शामिल बताया गया है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी विवादित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है।
मध्य‑पूर्व की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)—ईरान और ओमान के बीच स्थित संकरा समुद्री मार्ग, जिससे होकर दुनिया के बड़े हिस्से का तेल निर्यात गुजरता है।
यूएई के राष्ट्रपति के सलाहकार अनवर गर्गाश ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान इस मार्ग को नियंत्रित या राजनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करता है तो यह बेहद खतरनाक मिसाल होगी। इसलिए किसी भी समझौते में इस जलमार्ग से स्वतंत्र और सुरक्षित आवाजाही की गारंटी होना जरूरी है।
अगर इस मार्ग में व्यवधान होता है तो वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल और व्यापक आर्थिक झटका लग सकता है।
ग़ल्फ देशों के कई अधिकारी मानते हैं कि युद्ध का एक और दौर पूरे मध्य‑पूर्व को अस्थिर कर सकता है। गर्गाश ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी समझौते की संभावना फिलहाल लगभग “50‑50” है।
उनका तर्क है कि सिर्फ अस्थायी युद्धविराम काफी नहीं होगा—समझौते में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, मिसाइल क्षमता और समुद्री सुरक्षा जैसे मूल विवादों को भी हल करना होगा, वरना संघर्ष फिर भड़क सकता है।
फिलहाल ग़ल्फ देशों की रणनीति साफ है: सैन्य टकराव को टालना, बातचीत को जारी रखना और ऐसा समझौता करवाना जो सुरक्षा और आर्थिक दोनों चिंताओं को संबोधित करे।
लेकिन अंतिम समाधान इस बात पर निर्भर करेगा कि वॉशिंगटन और तेहरान अपने मुख्य हितों के बीच संतुलन बना पाते हैं या नहीं—एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी परमाणु कार्यक्रम पर कड़े नियंत्रण चाहते हैं, जबकि दूसरी तरफ ईरान प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक पहुंच की मांग कर रहा है।
जब तक इन मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तब तक मध्य‑पूर्व के इस बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र में तनाव और अनिश्चितता बनी रहने की संभावना है।
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यूएई, सऊदी अरब और क़तर के नेताओं ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से ईरान पर प्रस्तावित अमेरिकी हमले टालने को कहा ताकि चल रही कूटनीतिक वार्ताओं को मौका मिल सके। [37][34]
यूएई, सऊदी अरब और क़तर के नेताओं ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से ईरान पर प्रस्तावित अमेरिकी हमले टालने को कहा ताकि चल रही कूटनीतिक वार्ताओं को मौका मिल सके। [37][34] अमेरिका‑ईरान बातचीत का केंद्र ईरान का परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत, विदेशों में जमे ईरानी फंड और होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा जैसे मुद्दे हैं। [25][51][57]
यूएई के सलाहकार अनवर गर्गाश ने चेतावनी दी है कि नया सैन्य संघर्ष क्षेत्र को और अस्थिर कर सकता है और किसी भी समझौते में होर्मुज़ के जरिए सुरक्षित नौवहन की गारंटी जरूरी है। [4][11]