इसी कारण निवेशक उभरते बाजारों की परिसंपत्तियों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले निवेशों की ओर जा रहे हैं।
इस वैश्विक दबाव का असर एशियाई मुद्राओं पर साफ दिख रहा है। मई 2026 में भारतीय रुपया लगभग 96.25 प्रति अमेरिकी डॉलर तक गिर गया—जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर है। तेल की ऊंची कीमतें, भू‑राजनीतिक तनाव और मजबूत डॉलर इसके प्रमुख कारण बताए गए हैं।
इसी तरह इंडोनेशियाई रुपिया भी रिकॉर्ड गिरावट के साथ लगभग 17,668 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक वित्तीय बाजारों में तनाव ने इंडोनेशिया की मुद्रा और वित्तीय बाजारों दोनों पर दबाव डाला।
यह केवल दो देशों तक सीमित नहीं है—पूरे एशिया में कई मुद्राएं कमजोर हुई हैं क्योंकि निवेशक ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के जोखिम का फिर से आकलन कर रहे हैं।
मुद्राओं पर दबाव का कारण सिर्फ तेल नहीं है। अमेरिकी ट्रेज़री यील्ड बढ़ने से अमेरिकी निवेश अधिक आकर्षक हो जाते हैं।
जब अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो वैश्विक निवेशक बेहतर रिटर्न के लिए डॉलर‑आधारित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं। इससे डॉलर मजबूत होता है और उभरते बाजारों से पूंजी का बहिर्वाह बढ़ सकता है।
इंडोनेशिया जैसे देशों में यही हुआ—रुपिया की गिरावट के साथ‑साथ स्थानीय शेयर बाजार और बॉन्ड बाजारों पर भी दबाव बढ़ गया क्योंकि विदेशी निवेशक अपनी हिस्सेदारी घटाने लगे।
मुद्रा की कमजोरी महंगाई के झटके को और बढ़ा देती है।
जब स्थानीय मुद्रा गिरती है, तो डॉलर में खरीदे जाने वाले आयात—जैसे कच्चा तेल—घरेलू मुद्रा में और महंगे हो जाते हैं। इससे ईंधन, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के आसपास तनाव बना रहता है और तेल $100 से ऊपर रहता है, तो भारत जैसे देशों में महंगाई और चालू खाते का दबाव बढ़ सकता है और रुपया और कमजोर हो सकता है।
तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर मुद्रा और पूंजी बहिर्वाह—इन तीनों का संयोजन केंद्रीय बैंकों के लिए कठिन स्थिति पैदा करता है।
ऐसी स्थिति में उन्हें अक्सर कई कदमों पर विचार करना पड़ता है, जैसे:
भारत में ट्रेडरों ने कई बार सरकारी बैंकों द्वारा डॉलर बेचने की सूचना दी है, जिसे अक्सर भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर से बाजार में हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है।
एशियाई मुद्राओं का भविष्य अब तीन बड़े वैश्विक कारकों पर निर्भर करता है:
यदि तेल महंगा बना रहता है और डॉलर मजबूत रहता है, तो एशिया की कई आयात‑निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं आगे भी दबाव में रह सकती हैं क्योंकि निवेशक अधिक जोखिम प्रीमियम मांगेंगे।
हालांकि, यदि मध्य‑पूर्व में तनाव कम होता है या तेल की कीमतें गिरती हैं, तो एशियाई मुद्राओं और वित्तीय बाजारों पर दबाव कुछ कम हो सकता है।
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