जापान के लिए यह संकट खास तौर पर गंभीर है। उसकी करीब 95% तेल आपूर्ति मध्य पूर्व से आती है और सामान्य तौर पर उसके लगभग 70% तेल आयात हॉर्मुज़ से होकर गुजरते हैं। मार्च में जापान के पास राष्ट्रीय, निजी और तेल उत्पादक देशों से जुड़े भंडार मिलाकर करीब 254 दिनों की खपत के बराबर आपातकालीन भंडार था।
विदेशी भंडार का फायदा यह है कि संकट के दौरान जापान को खाड़ी के भीतर किसी नए टैंकर के लोड होने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। रिफाइनरियों के नजदीक मौजूद कच्चे तेल को अपेक्षाकृत जल्दी इस्तेमाल किया जा सकता है।
दक्षिण कोरिया भी आपूर्ति के रास्तों में विविधता ला रहा है। सियोल ने कहा है कि उसने साल के अंत तक हॉर्मुज़ से बाहर के मार्गों से 27.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल और 21 लाख टन नैफ्था की व्यवस्था की है। वह बाईपास पाइपलाइनों और जलडमरूमध्य के बाहर तेल भंडारण पर भी चर्चा कर रहा है।
जापान और अबू धाबी ने 2009 में कागोशिमा में संयुक्त तेल-भंडारण परियोजना शुरू की थी। इसका उद्देश्य जापान को आपातकाल में कच्चे तेल तक पहुंच देना और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) को एशिया में एक आपूर्ति आधार उपलब्ध कराना था।
बाद में जापान और यूएई ने इस व्यवस्था को नवीनीकृत और विस्तारित किया। रिपोर्टों के अनुसार, ADNOC की जापान में लीज पर ली गई क्षमता 80 लाख बैरल से अधिक हो चुकी थी।
जापान के ओकिनावा में सऊदी अरामको के कच्चे तेल के भंडारण की भी पुरानी व्यवस्था है। एक समझौते के तहत अरामको वहां 63 लाख बैरल तक तेल रख सकती थी। क्यूशू में ADNOC के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था रही है।
मई 2026 में जापान और यूएई ने यूएई से अतिरिक्त तेल आपूर्ति तथा संयुक्त भंडार बढ़ाने पर बातचीत करने पर सहमति जताई थी। इसलिए मौजूदा प्रस्ताव किसी बिल्कुल नई व्यवस्था के बजाय पहले से चल रहे मॉडल का बड़ा विस्तार लगता है।
अगर दोनों देशों के मौजूदा करीब 80 लाख बैरल के भंडार को 10 गुना किया जाता है, तो जापान में प्रत्येक देश के लिए लगभग 8 करोड़ बैरल जगह चाहिए होगी। यह केवल खाली टैंक भरने का मामला नहीं होगा, बल्कि एक बड़ा लॉजिस्टिक प्रोजेक्ट बनेगा।
मुख्य चुनौतियां इस प्रकार हैं:
सार्वजनिक रिपोर्टिंग फिलहाल बातचीत और मौजूदा सहयोग की पुष्टि करती है, पूर्ण 10 गुना विस्तार की नहीं।
सऊदी अरब और यूएई ऐसी पाइपलाइनों तथा बंदरगाहों पर भी निर्भर कर रहे हैं जो कुछ मात्रा में कच्चे तेल को हॉर्मुज़ से बाहर के निर्यात मार्गों तक पहुंचा सकते हैं। जापान के रिफाइनरी उद्योग ने आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने और हॉर्मुज़ से अलग वैकल्पिक पाइपलाइन मार्गों को व्यवहार्य बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
खाड़ी देश भी वैकल्पिक मार्गों का विस्तार कर रहे हैं, लेकिन इन परियोजनाओं में अरबों डॉलर लग सकते हैं और इन्हें पूरा होने में कई वर्ष लगते हैं।
इन मार्गों की अपनी सीमाएं हैं। सऊदी अरब से लाल सागर की ओर जाने वाले तेल को आगे बाब-अल-मंदेब से गुजरना पड़ सकता है। यूएई के फुजैरा जैसे बंदरगाह भी अपनी क्षमता और खाड़ी के बाहर सुरक्षित जहाजरानी पर निर्भर हैं।
लाल सागर का हालिया जोखिम इस समस्या को स्पष्ट करता है। हौथी नाकेबंदी से बाब-अल-मंदेब के पास सऊदी जहाजरानी प्रभावित होने की रिपोर्ट आई थी। इसका मतलब है कि एक ऊर्जा-चोकपॉइंट को बायपास करने वाला मार्ग दूसरे समुद्री जोखिम के सामने खुला रह सकता है।
इसलिए भंडारण टैंक, पाइपलाइन और वैकल्पिक टर्मिनल अलग-अलग समाधान नहीं, बल्कि सुरक्षा की कई परतें हैं। इनमें से कोई भी अकेले हॉर्मुज़ के सामान्य स्तर के आवागमन की जगह नहीं ले सकता।
अमेरिका की ईरान पर बढ़ती प्रतिबंध नीति एशियाई खरीदारों के लिए गैर-ईरानी तेल की आपूर्ति को और महत्वपूर्ण बना सकती है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने चीन की स्वतंत्र रिफाइनरी हेंगली पेट्रोकेमिकल (डालियान) रिफाइनरी के साथ करीब 40 जहाजरानी कंपनियों और जहाजों पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिन्हें ईरान के तेल कारोबार से जोड़ा गया।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने आगे ऐसे कदमों के संकेत दिए हैं जिन्हें अभूतपूर्व बताया गया है। हालांकि, अतिरिक्त चीनी रिफाइनरियों या बैंकों के खिलाफ संभावित कार्रवाई का अंतिम दायरा उपलब्ध रिपोर्टों में स्पष्ट नहीं है।
कड़े प्रतिबंध ईरान की तेल बिक्री, शिपिंग और भुगतान व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। इससे उसके विदेशी मुद्रा राजस्व पर दबाव बढ़ेगा, जबकि युद्ध के कारण परिवहन और उपभोक्ता लागत पहले ही बढ़ रही है। इसका परिणाम महंगाई, सामान की कमी और ईंधन की मांग पर नियंत्रण के रूप में सामने आ सकता है।
लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि पूरे ईरान में ऊर्जा राशनिंग पहले ही लागू की जा चुकी है। इसलिए इसे अभी एक संभावित जोखिम के रूप में देखना चाहिए, पक्की घटना के रूप में नहीं।
प्रतिबंधों से जापान, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब और यूएई के लिए आपूर्ति की निश्चितता का महत्व बढ़ता है। दूसरी ओर, इससे भंडारण समझौते भी जटिल हो सकते हैं, क्योंकि तेल के मालिकाना हक, भुगतान चैनल, बीमा, जहाजों और अंतिम खरीदारों की अधिक कड़ी जांच होगी।
विदेशी भंडार, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता, बाईपास पाइपलाइन और रणनीतिक भंडार हॉर्मुज़ संकट के आर्थिक असर और उसकी अवधि को कम कर सकते हैं। लेकिन लंबे समय तक बंद रहने पर वे खोई हुई पूरी आपूर्ति को जल्दी बहाल नहीं कर सकते। एक अनुमान के अनुसार, संकट से वैश्विक तेल प्रवाह में करीब 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कमी आई है।
यही वजह है कि जापान और दक्षिण कोरिया के साथ चल रही चर्चाएं महत्वपूर्ण हैं, भले ही वे प्रस्तावित पैमाने पर आगे न बढ़ें। वे इस बदलाव का संकेत देती हैं कि हॉर्मुज़ को अब केवल अस्थायी जहाजरानी जोखिम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आपूर्ति-श्रृंखला कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है।
व्यावहारिक समाधान एक मिश्रित रणनीति होगी—एशियाई रिफाइनरियों के पास अधिक भंडारण, अतिरिक्त पाइपलाइन और टर्मिनल क्षमता, अलग-अलग देशों से कच्चे तेल की खरीद, स्पष्ट आपातकालीन रिलीज नियम और तेल की मांग में कमी।
हालांकि, इन उपायों में समय, पैसा और देशों के बीच तालमेल लगेगा। अगर हॉर्मुज़, लाल सागर और बाब-अल-मंदेब, बीमा बाजार, प्रतिबंधों का अनुपालन और एशियाई रिफाइनरियों के भंडार एक साथ दबाव में आ गए, तो कोई एक भंडार वैश्विक तेल बाजार के लिए पर्याप्त सुरक्षा-कवच नहीं बन सकेगा।
जापान के लिए यह संकट खास तौर पर गंभीर है। उसकी करीब 95% तेल आपूर्ति मध्य पूर्व से आती है और सामान्य तौर पर उसके लगभग 70% तेल आयात हॉर्मुज़ से होकर गुजरते हैं। मार्च में जापान के पास राष्ट्रीय, निजी और तेल उत्पादक देशों से जुड़े भंडार मिलाकर करीब 254 दिनों की खपत के बराबर आपातकालीन भंडार था।
विदेशी भंडार का फायदा यह है कि संकट के दौरान जापान को खाड़ी के भीतर किसी नए टैंकर के लोड होने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। रिफाइनरियों के नजदीक मौजूद कच्चे तेल को अपेक्षाकृत जल्दी इस्तेमाल किया जा सकता है।
दक्षिण कोरिया भी आपूर्ति के रास्तों में विविधता ला रहा है। सियोल ने कहा है कि उसने साल के अंत तक हॉर्मुज़ से बाहर के मार्गों से 27.3 करोड़ बैरल कच्चे तेल और 21 लाख टन नैफ्था की व्यवस्था की है। वह बाईपास पाइपलाइनों और जलडमरूमध्य के बाहर तेल भंडारण पर भी चर्चा कर रहा है।
जापान और अबू धाबी ने 2009 में कागोशिमा में संयुक्त तेल-भंडारण परियोजना शुरू की थी। इसका उद्देश्य जापान को आपातकाल में कच्चे तेल तक पहुंच देना और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) को एशिया में एक आपूर्ति आधार उपलब्ध कराना था।
बाद में जापान और यूएई ने इस व्यवस्था को नवीनीकृत और विस्तारित किया। रिपोर्टों के अनुसार, ADNOC की जापान में लीज पर ली गई क्षमता 80 लाख बैरल से अधिक हो चुकी थी।
जापान के ओकिनावा में सऊदी अरामको के कच्चे तेल के भंडारण की भी पुरानी व्यवस्था है। एक समझौते के तहत अरामको वहां 63 लाख बैरल तक तेल रख सकती थी। क्यूशू में ADNOC के लिए भी इसी तरह की व्यवस्था रही है।
मई 2026 में जापान और यूएई ने यूएई से अतिरिक्त तेल आपूर्ति तथा संयुक्त भंडार बढ़ाने पर बातचीत करने पर सहमति जताई थी। इसलिए मौजूदा प्रस्ताव किसी बिल्कुल नई व्यवस्था के बजाय पहले से चल रहे मॉडल का बड़ा विस्तार लगता है।
अगर दोनों देशों के मौजूदा करीब 80 लाख बैरल के भंडार को 10 गुना किया जाता है, तो जापान में प्रत्येक देश के लिए लगभग 8 करोड़ बैरल जगह चाहिए होगी। यह केवल खाली टैंक भरने का मामला नहीं होगा, बल्कि एक बड़ा लॉजिस्टिक प्रोजेक्ट बनेगा।
मुख्य चुनौतियां इस प्रकार हैं:
सार्वजनिक रिपोर्टिंग फिलहाल बातचीत और मौजूदा सहयोग की पुष्टि करती है, पूर्ण 10 गुना विस्तार की नहीं।
सऊदी अरब और यूएई ऐसी पाइपलाइनों तथा बंदरगाहों पर भी निर्भर कर रहे हैं जो कुछ मात्रा में कच्चे तेल को हॉर्मुज़ से बाहर के निर्यात मार्गों तक पहुंचा सकते हैं। जापान के रिफाइनरी उद्योग ने आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने और हॉर्मुज़ से अलग वैकल्पिक पाइपलाइन मार्गों को व्यवहार्य बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
खाड़ी देश भी वैकल्पिक मार्गों का विस्तार कर रहे हैं, लेकिन इन परियोजनाओं में अरबों डॉलर लग सकते हैं और इन्हें पूरा होने में कई वर्ष लगते हैं।
इन मार्गों की अपनी सीमाएं हैं। सऊदी अरब से लाल सागर की ओर जाने वाले तेल को आगे बाब-अल-मंदेब से गुजरना पड़ सकता है। यूएई के फुजैरा जैसे बंदरगाह भी अपनी क्षमता और खाड़ी के बाहर सुरक्षित जहाजरानी पर निर्भर हैं।
लाल सागर का हालिया जोखिम इस समस्या को स्पष्ट करता है। हौथी नाकेबंदी से बाब-अल-मंदेब के पास सऊदी जहाजरानी प्रभावित होने की रिपोर्ट आई थी। इसका मतलब है कि एक ऊर्जा-चोकपॉइंट को बायपास करने वाला मार्ग दूसरे समुद्री जोखिम के सामने खुला रह सकता है।
इसलिए भंडारण टैंक, पाइपलाइन और वैकल्पिक टर्मिनल अलग-अलग समाधान नहीं, बल्कि सुरक्षा की कई परतें हैं। इनमें से कोई भी अकेले हॉर्मुज़ के सामान्य स्तर के आवागमन की जगह नहीं ले सकता।
अमेरिका की ईरान पर बढ़ती प्रतिबंध नीति एशियाई खरीदारों के लिए गैर-ईरानी तेल की आपूर्ति को और महत्वपूर्ण बना सकती है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने चीन की स्वतंत्र रिफाइनरी हेंगली पेट्रोकेमिकल (डालियान) रिफाइनरी के साथ करीब 40 जहाजरानी कंपनियों और जहाजों पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिन्हें ईरान के तेल कारोबार से जोड़ा गया।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने आगे ऐसे कदमों के संकेत दिए हैं जिन्हें अभूतपूर्व बताया गया है। हालांकि, अतिरिक्त चीनी रिफाइनरियों या बैंकों के खिलाफ संभावित कार्रवाई का अंतिम दायरा उपलब्ध रिपोर्टों में स्पष्ट नहीं है।
कड़े प्रतिबंध ईरान की तेल बिक्री, शिपिंग और भुगतान व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। इससे उसके विदेशी मुद्रा राजस्व पर दबाव बढ़ेगा, जबकि युद्ध के कारण परिवहन और उपभोक्ता लागत पहले ही बढ़ रही है। इसका परिणाम महंगाई, सामान की कमी और ईंधन की मांग पर नियंत्रण के रूप में सामने आ सकता है।
लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि पूरे ईरान में ऊर्जा राशनिंग पहले ही लागू की जा चुकी है। इसलिए इसे अभी एक संभावित जोखिम के रूप में देखना चाहिए, पक्की घटना के रूप में नहीं।
प्रतिबंधों से जापान, दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब और यूएई के लिए आपूर्ति की निश्चितता का महत्व बढ़ता है। दूसरी ओर, इससे भंडारण समझौते भी जटिल हो सकते हैं, क्योंकि तेल के मालिकाना हक, भुगतान चैनल, बीमा, जहाजों और अंतिम खरीदारों की अधिक कड़ी जांच होगी।
विदेशी भंडार, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता, बाईपास पाइपलाइन और रणनीतिक भंडार हॉर्मुज़ संकट के आर्थिक असर और उसकी अवधि को कम कर सकते हैं। लेकिन लंबे समय तक बंद रहने पर वे खोई हुई पूरी आपूर्ति को जल्दी बहाल नहीं कर सकते। एक अनुमान के अनुसार, संकट से वैश्विक तेल प्रवाह में करीब 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन की कमी आई है।
यही वजह है कि जापान और दक्षिण कोरिया के साथ चल रही चर्चाएं महत्वपूर्ण हैं, भले ही वे प्रस्तावित पैमाने पर आगे न बढ़ें। वे इस बदलाव का संकेत देती हैं कि हॉर्मुज़ को अब केवल अस्थायी जहाजरानी जोखिम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आपूर्ति-श्रृंखला कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है।
व्यावहारिक समाधान एक मिश्रित रणनीति होगी—एशियाई रिफाइनरियों के पास अधिक भंडारण, अतिरिक्त पाइपलाइन और टर्मिनल क्षमता, अलग-अलग देशों से कच्चे तेल की खरीद, स्पष्ट आपातकालीन रिलीज नियम और तेल की मांग में कमी।
हालांकि, इन उपायों में समय, पैसा और देशों के बीच तालमेल लगेगा। अगर हॉर्मुज़, लाल सागर और बाब-अल-मंदेब, बीमा बाजार, प्रतिबंधों का अनुपालन और एशियाई रिफाइनरियों के भंडार एक साथ दबाव में आ गए, तो कोई एक भंडार वैश्विक तेल बाजार के लिए पर्याप्त सुरक्षा-कवच नहीं बन सकेगा।