दक्षिण कोरिया विशेष रूप से संवेदनशील है। उसके लगभग 70% कच्चे तेल का आयात इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, साथ ही LNG का भी एक हिस्सा इसी मार्ग पर निर्भर है।
सियोल की तत्काल रणनीति मुख्य रूप से स्थिति की निगरानी और कूटनीतिक संपर्कों पर केंद्रित है।
दक्षिण कोरिया के मिनिस्ट्री ऑफ ट्रेड, इंडस्ट्री एंड एनर्जी ने आपात बैठकें आयोजित कर यह आकलन शुरू किया है कि अगर जलडमरूमध्य लंबे समय तक बाधित रहता है तो ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार और औद्योगिक उत्पादन पर क्या असर पड़ेगा। अधिकारियों ने मध्य‑पूर्व की स्थिति और घरेलू सप्लाई चेन पर संभावित प्रभावों की लगातार निगरानी की बात कही है।
कूटनीतिक स्तर पर सियोल ने ईरान सहित कई देशों के साथ बातचीत भी शुरू की है ताकि जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित की जा सके और समुद्री मार्ग सामान्य बनाए रखा जा सके।
इसके साथ ही दक्षिण कोरिया ने बहुराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा प्रयासों में योगदान देने की संभावना भी जताई है। राष्ट्रपति ली जे‑म्योंग ने कहा कि देश हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए “ठोस योगदान” देगा।
दक्षिण कोरिया की मौजूदा प्राथमिकताएँ broadly तीन स्तरों पर हैं:
जापान की रणनीति दो दिशाओं में आगे बढ़ रही है—एक तरफ तत्काल ऊर्जा प्रवाह को सुरक्षित रखना, दूसरी तरफ भविष्य के जोखिम को कम करना।
संकट के दौरान जापान से जुड़ा एक तेल टैंकर, जिसे ऊर्जा कंपनी Eneos संचालित करती है, सफलतापूर्वक हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने में सक्षम रहा। इसे जापान के कूटनीतिक प्रयासों के संकेत के रूप में देखा गया, जो तनाव के बावजूद ऊर्जा आयात जारी रखने की कोशिश कर रहा है।
दीर्घकालिक स्तर पर टोक्यो ऊर्जा और औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने पर भी जोर दे रहा है। जापान का मिनिस्ट्री ऑफ इकॉनमी, ट्रेड एंड इंडस्ट्री (METI) बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स—जैसे लिथियम, कॉपर और रेयर अर्थ—की सुरक्षित सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए कई देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है।
इसी रणनीति के तहत जापान ने संसाधन‑समृद्ध देशों के साथ सहयोग बढ़ाया है, जिसमें इंडोनेशिया के साथ खनिज सहयोग और अफ्रीकी देशों के खनन क्षेत्र से जुड़ी पहलें शामिल हैं। इसका उद्देश्य वैकल्पिक स्रोतों को मजबूत करना और लंबी अवधि में रणनीतिक निर्भरता कम करना है।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा प्रवाह का केंद्र है, इसलिए इसकी सुरक्षा अब कई देशों की साझा प्राथमिकता बनती जा रही है।
26 देशों के एक संयुक्त बयान—जिसमें जापान और दक्षिण कोरिया भी शामिल हैं—ने जलडमरूमध्य में सामान्य यातायात बहाल करने का समर्थन किया और नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य क्षमताओं के इस्तेमाल की इच्छा जताई।
इसके अलावा दर्जनों देशों की भागीदारी वाले अंतरराष्ट्रीय बैठकों में समुद्री सुरक्षा अभियानों, नौसैनिक गश्त और संभावित माइन‑क्लियरिंग जैसे उपायों पर भी चर्चा हुई है।
ऊर्जा आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह साफ संकेत है कि केवल राष्ट्रीय नीतियाँ पर्याप्त नहीं हैं—ऐसे रणनीतिक समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य होता जा रहा है।
हॉर्मुज़ संकट ने एशिया की ऊर्जा नीति में एक बड़े बदलाव को रेखांकित किया है। आज ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ तेल या गैस के अनुबंधों तक सीमित नहीं रही—यह समुद्री मार्गों की सुरक्षा, भू‑राजनीतिक स्थिरता और विविध सप्लाई‑चेन पर भी निर्भर करती है।
जापान का क्रिटिकल मिनरल्स और नए साझेदारों पर ध्यान तथा दक्षिण कोरिया की समुद्री सुरक्षा कूटनीति और आपूर्ति निगरानी—दोनों रणनीतियाँ उसी व्यापक चुनौती का अलग‑अलग जवाब हैं।
यदि प्रमुख समुद्री chokepoints के आसपास भू‑राजनीतिक तनाव जारी रहता है, तो आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर एशिया की ऊर्जा नीति इन्हीं रणनीतियों के इर्द‑गिर्द आकार ले सकती है।
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