इसी केबल के जरिए ऑपरेटर को लाइव वीडियो मिलता है और नियंत्रण संकेत वापस ड्रोन तक भेजे जाते हैं।
इस डिजाइन से कई महत्वपूर्ण फायदे मिलते हैं:
इसी वजह से ये ड्रोन छोटे दायरे में सटीक हमलों के लिए खास तौर पर उपयोगी साबित हो रहे हैं।
इन ड्रोन को पारंपरिक वायु‑रक्षा प्रणालियों के लिए पहचानना भी चुनौतीपूर्ण है।
पहला कारण उनका आकार है—ये बहुत छोटे होते हैं और जमीन के काफी पास उड़ते हैं। ऐसे में रडार को उन्हें पेड़ों, इमारतों या ज़मीन के अन्य प्रतिबिंबों से अलग पहचानने में कठिनाई होती है, जिससे चेतावनी का समय कम हो जाता है।
दूसरा कारण उनका कम इंफ्रारेड सिग्नेचर है। छोटे इलेक्ट्रिक मोटर और हल्के ढाँचे के कारण ये बड़े ड्रोन, मिसाइल या विमान की तुलना में कम गर्मी पैदा करते हैं, इसलिए इंफ्रारेड सेंसर के लिए इन्हें ट्रैक करना कठिन हो सकता है।
तीसरा, ऑपरेटर इन्हें अक्सर पास के स्थानों से लॉन्च कर सकते हैं और पहाड़ियों या इमारतों के साथ‑साथ उड़ाते हैं, जिससे लक्ष्य तक पहुँचने का समय बहुत कम रह जाता है।
विश्लेषकों के अनुसार इस तकनीक का एक बड़ा असर लागत का असंतुलन है।
एक FPV ड्रोन की कीमत कुछ सौ डॉलर हो सकती है, जबकि उसे रोकने के लिए रडार, सेंसर, इंटरसेप्टर या रक्षा प्रणाली पर हजारों से लेकर लाखों डॉलर खर्च हो सकते हैं। कुछ शोधकर्ताओं ने इस स्थिति को इस तरह वर्णित किया है कि "सैकड़ों डॉलर की तकनीक लाखों डॉलर की प्रणालियों को चुनौती दे रही है।"
यह रणनीति रूस‑यूक्रेन युद्ध में भी व्यापक रूप से देखी गई, जहाँ 2025 तक FPV ड्रोन युद्धक्षेत्र का प्रमुख हथियार बन गए थे। हिज़्बुल्लाह ने भी इसी प्रकार की रणनीतियाँ अपनाकर उन्हें इज़राइल‑लेबनान सीमा पर लागू किया है।
इस बढ़ते खतरे के जवाब में इज़राइल ने कई नई रक्षा रणनीतियाँ तेज़ी से लागू करनी शुरू की हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, इज़राइली सरकार ने FPV ड्रोन खतरे का मुकाबला करने के लिए लगभग NIS 2 अरब (करीब $700 मिलियन) का बजट स्वीकृत किया है।
कई प्रकार की तकनीकों और उपायों पर एक साथ काम चल रहा है:
इज़राइली रक्षा बलों (IDF) ने वाहनों और सैन्य ठिकानों पर बड़े सुरक्षा जाल लगाने शुरू किए हैं ताकि ड्रोन सीधे सैनिकों या उपकरणों से टकराकर विस्फोट न कर सकें। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 20 लाख वर्ग फुट सुरक्षा जाल अग्रिम पंक्ति की इकाइयों को वितरित किए जा चुके हैं।
क्योंकि इन ड्रोन को जैम करना मुश्किल है, कुछ प्रणालियाँ उन्हें पास से भौतिक रूप से नष्ट करने पर केंद्रित हैं—जैसे स्वायत्त इंटरसेप्टर ड्रोन या छोटे क्वाडकॉप्टर को गिराने वाले काइनेटिक सिस्टम।
इज़राइल छोटे और बहुत नीचे उड़ने वाले ड्रोन को पहचानने के लिए नए सेंसर और रडार विकसित करने की प्रक्रिया भी तेज़ कर रहा है, क्योंकि पारंपरिक वायु‑रक्षा प्रणालियाँ ऐसे लक्ष्यों के लिए डिजाइन नहीं थीं।
बहुत कम दूरी पर सैनिक महंगे मिसाइल इंटरसेप्टर की बजाय सरल उपायों—जैसे विशेष शॉटगन कारतूस या छोटे हथियार—का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसका उद्देश्य सस्ते हमलावर ड्रोन के खिलाफ रक्षा की लागत कम रखना है।
सैन्य अधिकारियों के अनुसार फिलहाल फाइबर‑ऑप्टिक FPV ड्रोन खतरे का कोई एक पूर्ण समाधान मौजूद नहीं है और कई अलग‑अलग तकनीकों का परीक्षण किया जा रहा है।
इसका महत्व केवल नई तकनीक तक सीमित नहीं है। यह युद्ध के बदलते स्वरूप को भी दर्शाता है—जहाँ छोटे, सस्ते और तेजी से बनाए जा सकने वाले ड्रोन पारंपरिक वायु‑रक्षा प्रणालियों की कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्नत सेनाओं को भी चुनौती दे सकते हैं।
आने वाले वर्षों में कम‑लागत हमलावर ड्रोन और उनके खिलाफ बहु‑स्तरीय रक्षा प्रणालियों के बीच यह तकनीकी प्रतिस्पर्धा आधुनिक युद्ध की रणनीति को काफी हद तक आकार दे सकती है।
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