कई रिपोर्टों का दावा है कि मॉडल ने मुख्य ऑपरेटिंग सिस्टम और वेब ब्राउज़रों में बड़ी संख्या में पहले से अज्ञात कमजोरियाँ—जिन्हें "zero‑day" कहा जाता है—खोजीं।
उदाहरण के तौर पर, कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी में OpenBSD के नेटवर्किंग स्टैक में मौजूद एक पुरानी बग का उल्लेख किया गया है जो दशकों तक कोड समीक्षा और स्वचालित सुरक्षा परीक्षणों के बावजूद नहीं पकड़ी गई थी।
हालाँकि, अभी भी कई तकनीकी विवरण सार्वजनिक नहीं हैं। अब तक कोई पूर्ण स्वतंत्र तकनीकी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है जो यह पुष्टि करे कि कुल कितनी कमजोरियाँ खोजी गईं या मॉडल कितनी विश्वसनीयता से exploit बना सकता है।
Mythos को सामान्य AI मॉडल की तरह लॉन्च करने के बजाय Anthropic ने Project Glasswing नाम का नियंत्रित साइबर सुरक्षा कार्यक्रम शुरू किया। इसका उद्देश्य सीमित और भरोसेमंद संगठनों को इस तकनीक तक पहुँच देना है।
इस पहल में दुनिया की कुछ बड़ी टेक और सुरक्षा कंपनियाँ शामिल हैं, जैसे:
ये संस्थाएँ मिलकर व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर में कमजोरियाँ खोजने और उन्हें जल्दी से पैच करने का काम कर रही हैं।
Anthropic का तर्क सीधा है: अगर कोई सिस्टम बड़े पैमाने पर कमजोरियाँ ढूँढ सकता है, तो हमलावर भी उसी क्षमता का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए पहले रक्षकों को यह तकनीक देना ज़रूरी है।
इस तरह Glasswing को एक “defense‑first” रणनीति माना जा रहा है—जहाँ AI का इस्तेमाल पहले सुरक्षा मजबूत करने के लिए किया जाए।
Mythos की खबर सामने आने के बाद कई सरकारी और वित्तीय संस्थानों ने इस पर ध्यान देना शुरू कर दिया है।
अमेरिका में नीति‑निर्माताओं ने टेक कंपनियों से AI‑आधारित साइबर हमलों के संभावित जोखिमों पर अतिरिक्त जानकारी माँगी है। इसमें Mythos जैसे मॉडल की क्षमताएँ भी चर्चा का विषय रही हैं।
वित्तीय क्षेत्र में भी चिंता दिखाई दी है। चूँकि बैंक और भुगतान प्रणालियाँ व्यापक सॉफ्टवेयर इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हैं, इसलिए किसी भी नई साइबर कमजोरी का सीधा असर वित्तीय स्थिरता पर पड़ सकता है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार नियामकों ने बड़े बैंकों के साथ बैठकें भी कीं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चेतावनी सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने कहा है कि उन्नत AI सिस्टम यदि सॉफ्टवेयर सुरक्षा को तोड़ने में सक्षम हो जाते हैं, तो वे वैश्विक वित्तीय प्रणाली के लिए प्रणालीगत जोखिम पैदा कर सकते हैं और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी।
इसके साथ ही कई देशों की साइबर सुरक्षा और खुफिया एजेंसियाँ भी इस बात का अध्ययन कर रही हैं कि ऐसे AI उपकरण भविष्य में साइबर युद्ध और साइबर रक्षा को कैसे बदल सकते हैं।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि AI पारंपरिक "vulnerability cycle" को बहुत तेज कर सकता है।
पहले जटिल सॉफ्टवेयर में गंभीर सुरक्षा खामियाँ ढूँढने में महीनों या वर्षों का समय लग सकता था। स्वचालित टेस्टिंग टूल्स ने यह प्रक्रिया कुछ तेज की, लेकिन फिर भी मानव शोधकर्ताओं पर काफी निर्भरता रहती थी।
अगर AI मॉडल स्वतः कमजोरियाँ खोजने और उनके exploit बनाने लगें, तो कमजोरी मिलने, उसे हथियार बनाने और बड़े पैमाने पर हमले शुरू होने के बीच का समय बहुत कम हो सकता है।
विश्लेषक इसे साइबर जोखिम चक्र के “संक्षिप्त होने” के रूप में देखते हैं।
हालाँकि मॉडल को सीमित रखा गया है, फिर भी कुछ चिंताएँ सामने आई हैं।
एक रिपोर्ट में कहा गया कि अप्रैल 2026 में एक छोटे समूह ने एक तृतीय‑पक्ष विक्रेता के सिस्टम के जरिए Mythos के प्रीव्यू वातावरण तक अनधिकृत पहुँच हासिल कर ली थी। यह सीधे Anthropic के इंफ्रास्ट्रक्चर का उल्लंघन नहीं था, लेकिन सुरक्षा सवाल जरूर उठे।
इसके अलावा कई महत्वपूर्ण सवाल अभी भी खुले हैं:
जब तक स्वतंत्र तकनीकी शोध और बेंचमार्क सामने नहीं आते, तब तक Mythos को लेकर किए गए कई बड़े दावों की पुष्टि करना मुश्किल है।
भले ही उपलब्ध जानकारी सीमित हो, Mythos की कहानी एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि AI जल्द ही साइबर सुरक्षा के सबसे शक्तिशाली उपकरणों में से एक बन सकता है—रक्षा और हमले दोनों के लिए।
Anthropic का मॉडल सीमित रखने का फैसला इसी डर को दर्शाता है कि अगर ऐसी तकनीक बिना नियंत्रण के उपलब्ध हो गई तो साइबर हमलों का पैमाना और गति दोनों बढ़ सकते हैं।
अब सवाल यह है कि Project Glasswing जैसी पहलें क्या वास्तव में संतुलन बना पाएँगी—यानी AI का उपयोग सिस्टम को सुरक्षित बनाने के लिए हमलावरों से तेज़ी से किया जा सकेगा या नहीं।
इसका जवाब भविष्य में तय करेगा कि आने वाले अत्याधुनिक AI मॉडल कैसे जारी किए जाएँगे और उन पर किस तरह के नियम लागू होंगे।
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