खलीफा उमर ने इस संकट से निपटने के लिए जो कदम उठाए, वे आज भी मिसाल के तौर पर पेश किए जाते हैं। उन्होंने एक साथ कई मोर्चों पर काम किया:
जब हालात काबू से बाहर होते दिखे, तो खलीफा उमर ने फैसला लिया कि अल्लाह से बारिश की प्रार्थना (इस्तिस्क़ा) की जाए। वह खुद पैगंबर मुहम्मद (स.) के चाचा अब्बास (रजि.) को ले गए और उनसे कहा कि आप दुआ करें। कहा जाता है कि जैसे ही उन्होंने प्रार्थना शुरू की, आसमान से बारिश की फुहारें गिरने लगीं और संकट टल गया ।
अक्सर एक गलतफहमी फैली है कि इस अकाल में कई सहाबा (पैगंबर के साथी) मारे गए। लेकिन ऐतिहासिक स्रोतों में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि कोई खास सहाबी केवल इसी अकाल के कारण मरे। हां, अबू उबैदाह इब्न अल-जर्राह, मुआज़ इब्न जबल, और यज़ीद इब्न अबू सुफ़ियान जैसे कई बड़े साथी 'ताऊन-ए-अमवास' में शहीद हुए थे, जो उसी वर्ष (हिजरी 18) फैला था, लेकिन यह एक अलग घटना थी ।
'आम-उर-रमादा' इस्लामी इतिहास की सबसे गंभीर मानवीय त्रासदियों में से एक है, लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि इसने एक ऐसे शासक (खलीफा उमर) को सामने ला खड़ा किया जिसने न्याय, समानता, व्यावहारिक सोच और प्रशासनिक कौशल के साथ इस चुनौती का डटकर मुकाबला किया। यह घटना आज भी किसी भी बड़े संकट के प्रबंधन के लिए एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।
विस्तृत सनदी (isnad) विश्लेषण के लिए, पहले इब्न साद की रिवायतों की तुलना तबरी की रिवायतों से करनी चाहिए और फिर इब्न कसीर की निगाह से देखना चाहिए कि विरोधाभासी बातों में क्या सच है।